अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 87/ मन्त्र 2
ऋषिः - अथर्वा
देवता - ध्रुवः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - राज्ञः संवरण सूक्त
49
इ॒हैवैधि॒ माप॑ च्योष्ठाः॒ पर्व॑त इ॒वावि॑चाचलत्। इन्द्र॑ इवे॒ह ध्रु॒वस्ति॑ष्ठे॒ह रा॒ष्ट्रमु॑ धारय ॥
स्वर सहित पद पाठइ॒ह । ए॒व । ए॒धि॒ । मा । अप॑ । च्यो॒ष्ठा॒: । पर्व॑त:ऽइव । अवि॑ऽचाचलत् । इन्द्र॑:ऽइव । इ॒ह ।ध्रु॒व: । ति॒ष्ठ॒ । रा॒ष्ट्रम् । ऊं॒ इति॑ । धारय ॥८७.२॥
स्वर रहित मन्त्र
इहैवैधि माप च्योष्ठाः पर्वत इवाविचाचलत्। इन्द्र इवेह ध्रुवस्तिष्ठेह राष्ट्रमु धारय ॥
स्वर रहित पद पाठइह । एव । एधि । मा । अप । च्योष्ठा: । पर्वत:ऽइव । अविऽचाचलत् । इन्द्र:ऽइव । इह ।ध्रुव: । तिष्ठ । राष्ट्रम् । ऊं इति । धारय ॥८७.२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
राजतिलक यज्ञ के लिये उपदेश।
पदार्थ
[हे राजन् !] (पर्वतः इव) पहाड़ के समान (अविचाचलत्) निश्चल स्वभाव तू (इह एव) यहाँ ही (एधि) रह, (मा अप च्योष्ठाः) कदापि मत गिर। (इन्द्रः इव) सूर्य के समान (इह) यहाँ पर (ध्रुवः) स्थिर स्वभाव होकर (तिष्ठ) ठहर, (उ) और (इह) यहाँ पर (राष्ट्रम्) राज्य को (धारय) अधिकार में रख ॥२॥
भावार्थ
प्रजागण धार्मिक राजा का यथावत् सहाय करें, जिससे वह प्रजापालन में ऐसा दृढ रहे, जैसे सूर्य अपनी कक्षा में स्थिर रह कर वृष्टि आदि से अनेक लोकों का पालन करता है ॥२॥
टिप्पणी
२−(इह) अस्माकं मध्ये (एव) निश्चयेन (एधि) अस भुवि−लोट्। भव। सर्वदा वर्तस्व (मा अप च्योष्ठाः) च्युङ् गतौ−माङि लुङि च्लेः सिच्। न माङ्योगे। पा० ६।४।७४। इत्यडभावः। कदापि प्रच्युतो मा भूः (पर्वतः) महीधरः (इव) यथा (अविचाचलत्) म० १। दृढस्वभावः (इन्द्रः) सूर्यः (इव) (इह) अस्मिन् राज्ये (ध्रुवः) स्थिरः (तिष्ठ) वर्तस्व (इह) अस्मिन् लोके (राष्ट्रम्) राज्यम् (उ) चार्थे (धारय) स्वाधिकारे स्थापय ॥
विषय
मर्यादित जीवनवाला राजा
पदार्थ
१. (इह एव एधि) = तू सदा इस राज्यसिंहासन पर ही हो। (मा अप च्योष्ठा:) = कभी भी इस राज्य से च्युत मत हो। (पर्वतः इव) = पर्वत की भाँति (अविचाचलत्) = दृढ हो-मार्ग से डाँवाडोल होनेवाला न हो। २. इन्द्र हे जितेन्द्रिय पुरुष! तू (इह एव) = इस राष्ट्र में ही (ध्रुवः तिष्ठ) = ध्रुव होकर रह (उ) = और (राष्ट्रम) = राष्ट्र को (धारय) = धारित कर। राष्ट्र की सब प्रजाओं को अपने-अपने कार्य में धारित कर-('राजा चतुरो वर्णान् स्वधर्म स्थापयेत्') । यही तो राष्ट्र-धारण का सर्वोत्तम प्रकार है।
भावार्थ
राजा पर्वत की भाँति कर्त्तव्यमर्यादा में स्थित होता हुआ कभी मार्ग से विचलित न हो। वह जितेन्द्रिय बनकर सब राष्ट्र का धारण करे-('जितेन्द्रियो हि शक्नोति वशे स्थापयितुं प्रजाः')|
भाषार्थ
(इह) इस राज्यासन पर (एव) ही (एधि) हो, (मा अप च्योष्ठाः) अपच्युत न हो, (पर्वतः इव) पर्वत के सदृश (अविचाचलत्) विना विचलित हुए। (इन्द्रः इव) सम्राट् के सदृश (इह) इस राज्यासन पर (ध्रुवः तिष्ठ) स्थिररूप में स्थित रह, (इह) इस राज्यासन पर स्थित हुआ (राष्ट्रम) राष्ट्र का (धारण) धारण-पोषण कर।
टिप्पणी
[इन्द्र है सम्राट्, साम्राज्य का अधिपति। मन्त्र में एक राष्ट्र के राजा का वर्णन हुआ है। यथा 'इन्द्रश्च सम्राट वरुणश्च राजा' (यजु० ८।३७)]।
विषय
राजा को स्थायी और दृढ़ शासक होने का उपदेश।
भावार्थ
हे राजन् ! (इह एव एधि) इस राष्ट्र में तू सत्तावान होकर रह। (मा अप च्योष्ठाः) तू कभी च्युत मत हो, तू अपने कर्त्तव्य से मत गिर। और (पर्वतः इव) पर्वत के समान (अविचाचलत्) किसी प्रकार विचलित न होता हुआ (इन्द्रः इव) सूर्य के समान (ध्रुवः) स्थिर होकर (इह) इस राजपद पर (तिष्ठ) विराज और (राष्ट्रम् उ धारय) राष्ट्र का पालन कर।
टिप्पणी
(द्वि०) ‘चाचलिः’ इति ऋ०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। ध्रुवो देवता। अनुष्टुभः। तृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Ruler’s Selection and Stability
Meaning
Stay here strong and firm, unmoved, unshakable like a mountain. O Ruler, rule at the centre constant as the Pole Star and hold the nation together in top condition.
Translation
Remain ever here. Do not be removed. Stay here seadfast just like the resplendent Lord and sustain here the kingdom.
Translation
Be ever here, fall not away and be firm like mountain unremoved. Stand steadfast here like the sun and bold the Kingdom under your control.
Translation
O King, stick to thy seat of royalty, forsake not thy duty, remove immovable like a mountain, stand steadfast in thy state like the sun, and hold the kingship in thy grasp.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२−(इह) अस्माकं मध्ये (एव) निश्चयेन (एधि) अस भुवि−लोट्। भव। सर्वदा वर्तस्व (मा अप च्योष्ठाः) च्युङ् गतौ−माङि लुङि च्लेः सिच्। न माङ्योगे। पा० ६।४।७४। इत्यडभावः। कदापि प्रच्युतो मा भूः (पर्वतः) महीधरः (इव) यथा (अविचाचलत्) म० १। दृढस्वभावः (इन्द्रः) सूर्यः (इव) (इह) अस्मिन् राज्ये (ध्रुवः) स्थिरः (तिष्ठ) वर्तस्व (इह) अस्मिन् लोके (राष्ट्रम्) राज्यम् (उ) चार्थे (धारय) स्वाधिकारे स्थापय ॥
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