अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 92 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 92/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - वाजी छन्दः - जगती सूक्तम् - वाजी सूक्त

    वात॑रंहा भव वाजिन्यु॒ज्यमा॑न॒ इन्द्र॑स्य याहि प्रस॒वे मनो॑जवाः। यु॒ञ्जन्तु॑ त्वा म॒रुतो॑ वि॒श्ववे॑दस॒ आ ते॒ त्वष्टा प॒त्सु ज॒वं द॑धातु ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वात॑ऽरंहा: । भ॒व॒ । वा॒जि॒न् । यु॒ज्यमा॑न: । इन्द्र॑स्य । या॒हि॒ । प्र॒ऽस॒वे । मन॑:ऽजवा: । यु॒ञ्जन्तु॑ । त्वा॒ । म॒रुत॑: । वि॒श्वऽवे॑दस: । आ । ते॒ । त्वष्टा॑ । प॒त्ऽसु । ज॒वम् । द॒धा॒तु॒ ॥९२.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    वातरंहा भव वाजिन्युज्यमान इन्द्रस्य याहि प्रसवे मनोजवाः। युञ्जन्तु त्वा मरुतो विश्ववेदस आ ते त्वष्टा पत्सु जवं दधातु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    वातऽरंहा: । भव । वाजिन् । युज्यमान: । इन्द्रस्य । याहि । प्रऽसवे । मन:ऽजवा: । युञ्जन्तु । त्वा । मरुत: । विश्वऽवेदस: । आ । ते । त्वष्टा । पत्ऽसु । जवम् । दधातु ॥९२.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 92; मन्त्र » 1

    पदार्थ -
    (वाजिन्) हे अन्न वा बलवाले राजन् ! (युज्यमानः) सावधान होकर (वातरंहाः) वायु के समान वेगवाला (भव) हो, और (इन्द्रस्य) परम ऐश्वर्यवाले जगदीश्वर की (प्रसवे) आज्ञा में (मनोजवाः) मन के समान गतिवाला होकर (याहि) चल। (विश्ववेदसः) समस्त विद्याओं वा धनोंवाले (मरुतः) दोषों के नाश करनेवाले विद्वान् लोग (त्वा) तुझको (युञ्जन्तु) [राज कार्य में] युक्त करें, (त्वष्टा) सूक्ष्मदर्शी मनुष्य (ते) तेरे (पत्सु) पगों में (जवम्) वेग को (आ) अच्छे प्रकार (दधातु) धारण करे ॥१॥

    भावार्थ -
    राजा परमेश्वर की वेदविहित आज्ञा में चलकर और नीतिज्ञ विद्वानों से मेल करके राज्य की रक्षा करे और यान विमान द्वारा अभीष्ट देशों में जाकर यथायत् कार्य सिद्ध करे ॥१॥ मन्त्र १, २ कुछ भेद से यजुर्वेद में है−अ० ९ म० ८, ९ ॥

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