अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 114/ मन्त्र 2
ऋषिः - भार्गवः
देवता - अग्नीषोमौ
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
53
प्रेतो य॑न्तु॒ व्याध्यः॒ प्रानु॒ध्याः प्रो अश॑स्तयः। अ॒ग्नी र॑क्ष॒स्विनी॑र्हन्तु॒ सोमो॑ हन्तु दुरस्य॒तीः ॥
स्वर सहित पद पाठप्र । इ॒त: । य॒न्तु॒ । विऽआ॑ध्य: । प्र । अ॒नु॒ऽध्या: । प्रो इति॑ । अश॑स्तय: ।अ॒ग्नि: । र॒क्ष॒स्विनी॑: । ह॒न्तु॒ । सोम॑: । ह॒न्तु॒ । दु॒र॒स्य॒ती: ॥११९.२॥
स्वर रहित मन्त्र
प्रेतो यन्तु व्याध्यः प्रानुध्याः प्रो अशस्तयः। अग्नी रक्षस्विनीर्हन्तु सोमो हन्तु दुरस्यतीः ॥
स्वर रहित पद पाठप्र । इत: । यन्तु । विऽआध्य: । प्र । अनुऽध्या: । प्रो इति । अशस्तय: ।अग्नि: । रक्षस्विनी: । हन्तु । सोम: । हन्तु । दुरस्यती: ॥११९.२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
राक्षसों के नाश का उपदेश।
पदार्थ
(इतः) यहाँ से (व्याध्यः) सब रोग (प्र) बाहिर, (अनुध्याः) सब अनुताप (प्र) बाहिर और (अशस्तयः) सब अपकीर्तियाँ (प्रो) बाहिर ही (यन्तु) चली जावें। (अग्निः) तेजस्वी राजा (रक्षस्विनी) राक्षसों से युक्त [सेनाओं] को (हन्तु) मारे और (सोमः) ऐश्वर्यवान् राजा (दुरस्यतीः) अनिष्ट चीतनेवाली [प्रजाओं] को (हन्तु) नाश करें ॥२॥
भावार्थ
राजा प्रजा में शान्ति रखने के लिये चोर डाकू आदि राक्षसों का नाश करें ॥२॥
टिप्पणी
२−(प्र) बहिर्भावे (इतः) अस्मात् स्थानात् (यन्तु) गच्छन्तु (व्याध्यः) उपसर्गे घोः किः। पा० ३।३।९२। वि+आङ्+डुधाञ्-कि। जसि, गुणस्थाने यणादेशः। व्याधयः। रोगाः (प्र) (अनुध्याः) आतश्चोपसर्गे। पा० ३।३।१०६। अनु+ध्यै चिन्तायाम्-अङ्, टाप्। अनुतापाः (प्रो) बहिरेव (अशस्तयः) अपकीर्तयः (अग्निः) तेजस्वी राजा (रक्षस्विनीः) अ० ६।२।२। राक्षसैर्युक्ताः सेनाः (हन्तु) नाशयतु (सोमः) ऐश्वर्यवान् राजा (हन्तु) (दुरस्यतीः) अ० १।२९।२। दुरस्य-शतृ, ङीप्। अनिष्टचिन्तिकाः प्रजाः ॥
विषय
रोगों व राक्षसीवृत्तियों का विनाश
पदार्थ
१. अग्नि ऐसा चाहता है कि (इत:) = यहाँ-इस राष्ट्र से (व्याध्यः) = सब रोग (प्रयन्तु) = दूर चले जाएँ। सफाई आदि की व्यवस्था इतनी ठीक हो कि रोग उत्पन्न ही न हो पाएँ। (अनुध्याः प्र) [यन्त] = सब अनुताप व दुश्चिन्तन दूर हों। (उ) = और (अशस्तयः प्र) = अस्तुतियों, परक्रतनिन्दाएँ व हिंसाएँ दूर हों। २. इसप्रकार (अग्नि:) = राष्ट्र का अग्रणी राजा राष्ट्र की (रभस्विनी:) = राक्षसी वृत्तिवाली शत्रु-सेनाओं को (हन्तु) = नष्ट करे तथा (सोमः) = सौम्य स्वभाववाला न्यायाधीश (दुरस्यती:) = [दुष्टं परेषाम् इच्छन्ती:] दूसरों का अशुभ चाहनेवाली प्रजाओं को (हन्तु) = राष्ट्र से दूर करे। ये अग्नि और सोम राष्ट्र के अन्त: व बाह्य शत्रुओं को दूर करके राष्ट्र को सुव्यवस्थित करें।
भावार्थ
राष्ट्र से रोगों, अनुतापों, परनिन्दाओं व हिंसाओं को दूर करके सुव्यवस्थित किया जाए। अग्नि और सोम [राजा व न्यायाधीश] मिलकर राष्ट्र को बाहर व अन्दर के शत्रुओं से बचाएँ।
सुव्यवस्थित राष्ट्र में लोग स्थिर मनोवृत्तिवाले [अथर्वा] तथा सरस अंगोंवाले [अंगिराः] शक्ति-सम्पन्न बनें। व्याधिरहित शरीरवाले, अनुतापरहित मनवाले ये 'अथर्वाङ्गिरा' अगले चार सूक्तों के ऋषि है -
भाषार्थ
(इतः) इस [हमारे राष्ट्र से] (व्याध्यः) व्याधियां अर्थात् रोग (प्र यन्तु) प्रयाण कर जांय, (अनुध्याः) चिन्ताएं (प्र) प्रयाण कर जांय, (अशस्तयः) अप्रशस्तियां आदि निन्दाएं, अपकीर्तियाँ (उ) निश्चय से (प्र) प्रयाण कर जांय (अग्नि) अग्रणी प्रधानमन्त्री (रक्षस्विनीः) राक्षस स्वभाव वाली [परकीय] सेनाओं का (हन्तु) हनन करे, (सोमः) सेनाध्यक्ष (दुरस्यतीः) दुरिच्छाओं वाली सेनाओं का (हन्तु) नाश करे।
टिप्पणी
[शत्रु के सब प्रकार के तेजों का जब अपहरण हो गया (मन्त्र १), तब अपने राष्ट्र की व्याधियों, आधियों, निन्दाओं और अपकीर्तियों ने मानो प्रयाण कर लिया, राष्ट्र से ये चली गईं। सोम= सेनाध्यक्ष (यजु० १७।४०)]।
विषय
स्त्री-पुरुषों में कलह के कारण।
भावार्थ
(उपाध्यः) नाना प्रकार की पीड़ाएं (इतः) इस हमारे घर से (प्र यन्तु) दूर हो जायँ। (प्र अनुध्याः) और उसके पीछे आने वाले दुष्परिणाम भी दूर हों, और उनके कारण होनेवाली (अशस्तयः) निन्दाएँ भी (प्र उ) दूर हों। (अग्निः) अग्नि के स्वभाव का होकर पुरुष (रक्षस्विनीः) कार्य में विघ्न करने वाली दुष्टाचारिणी स्त्रियों का (हन्तु) दमन करे और (सोमः) सौम्यभाव का पुरुष (दुरस्यतीः) दूसरों का बुरा चाहनेवाली दुष्ट प्रवृत्तियों का भी (हन्तु) विनाश करे। अपने घरों में इस प्रकार के बुरे रोग, बुरे विचार, उनसे उत्पन्न होने वाले कुपरिणाम, निन्दाएं, परकार्य में विघ्न डालने और दूसरों का बुरा चाहने की सब बुरी आदतों को पुरुष अग्नि के समान तीक्ष्ण और चन्द्र के समान प्रेममय होकर न आने दे। और बुरी आदतों वालों को भय दिखावे और प्रेम से समझावे।
टिप्पणी
‘वन्दनःऽश्व’ इति पदपाठोऽपि बहुश उपलभ्यते, प्रातिशाख्यानुसारी च सायणस्तु ‘वन्दनादव’ इति पदच्छेदं चकारं तथैव च शंकर पाण्डुरगंः॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
भार्गव ऋषिः। अग्नीषोमौ देवते। अनुष्टुप् छन्दः। द्वयृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Towards Self-integration
Meaning
Let all disharmoney and disjunctions of body, mind and soul go off, all sorrow and suffering, curses and imprecations be out of the system. Let Agni, light of life, dispel self-consumptive and self-destructive tendencies. Let Soma, life of life, creative and inspiring spirit of Divinity, make up and replenish all injuries of mind and soul caused by violent tendencies of the mind. Note: In this mantra, the word ‘vyadhayah’, plural form of ‘vyadhi’, is the key to the sukta. Vyadhi is the opposite of ‘samadhi’. Samadhi is the highest state of the mind and soul in harmony in meditation. In Yoga it means: Self-integration of the soul, Reintegration of the part with the whole, Reunion of the finite with the Infinite. It is a state of absolute harmony. Vyadhi is a state of total or partial disharmony. Hence mantra one is interpreted as an address to Desire insatiable, the root of disharmony, and the second as a prayer and resolution for harmony of body, mind and soul in total personality- integration.
Translation
May all the diseases flee away from here; may the worries flee as well as the evil fames. May the fire destroy the germs of wasting up diseases; may the medicinal herb (Soma) destroy the evil viruses (durasyath). (May the devotional bliss destroy the ill-wishers).
Comments / Notes
MANTRA NO 7.119.2AS PER THE BOOK
Translation
Let all the troubles poss. away from here, let all the bad effects and evils run away. Let the fire of the Yajna destroy disease due to germs and let the Soma, the pure water exterminate troubles and strains.
Translation
Let diseases and sufferings pass away, let cares and calumnies vanish hence. Let a powerful king destroy fiendish armies, let a dignified king destroy the disloyal subjects.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२−(प्र) बहिर्भावे (इतः) अस्मात् स्थानात् (यन्तु) गच्छन्तु (व्याध्यः) उपसर्गे घोः किः। पा० ३।३।९२। वि+आङ्+डुधाञ्-कि। जसि, गुणस्थाने यणादेशः। व्याधयः। रोगाः (प्र) (अनुध्याः) आतश्चोपसर्गे। पा० ३।३।१०६। अनु+ध्यै चिन्तायाम्-अङ्, टाप्। अनुतापाः (प्रो) बहिरेव (अशस्तयः) अपकीर्तयः (अग्निः) तेजस्वी राजा (रक्षस्विनीः) अ० ६।२।२। राक्षसैर्युक्ताः सेनाः (हन्तु) नाशयतु (सोमः) ऐश्वर्यवान् राजा (हन्तु) (दुरस्यतीः) अ० १।२९।२। दुरस्य-शतृ, ङीप्। अनिष्टचिन्तिकाः प्रजाः ॥
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