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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 117 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 117/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वाङ्गिराः देवता - इन्द्रः छन्दः - पथ्यापङ्क्तिः सूक्तम् - शत्रुनिवारण सूक्त
    10

    आ म॒न्द्रैरि॑न्द्र॒ हरि॑भिर्या॒हि म॒यूर॑रोमभिः। मा त्वा॒ के चि॒द्वि य॑म॒न्विं न पा॒शिनो॑ऽति॒ धन्वे॑व॒ ताँ इ॑हि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । म॒न्द्रै: । इ॒न्द्र॒ । हरि॑ऽभि: । या॒हि । म॒यूर॑रोमऽभि: । मा । त्वा॒ । के । चि॒त् । वि । य॒म॒न् । विम् । न । पा॒शिन॑: । अति॑ । धन्व॑ऽइव । तान् । इ॒हि॒ ॥१२२.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ मन्द्रैरिन्द्र हरिभिर्याहि मयूररोमभिः। मा त्वा के चिद्वि यमन्विं न पाशिनोऽति धन्वेव ताँ इहि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ । मन्द्रै: । इन्द्र । हरिऽभि: । याहि । मयूररोमऽभि: । मा । त्वा । के । चित् । वि । यमन् । विम् । न । पाशिन: । अति । धन्वऽइव । तान् । इहि ॥१२२.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 117; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (इन्द्र) हे प्रतापी राजन् ! (मन्द्रैः) गम्भीर ध्वनियों से वर्तमान (मयूररोमभिः) मोरों के रोम [समान चिकने, विचित्र रंग, दृढ़, बिजुली से युक्त रोमवस्त्र] वाले (हरिभिः) मनुष्यों और घोड़ों के साथ (आ याहि) तू आ। (त्वा) तुझको (केचित्) कोई भी (मा वि यमन्) कभी न रोकें (न) जैसे (पाशिनः) जालवाले [चिड़ीमार] (विम्) पक्षी को, तू (तान् अति) उनके ऊपर होकर (इहि) चल (धन्व इव) जैसे निर्जल देश [के ऊपर से] ॥१॥

    भावार्थ - राजा प्रजा की रक्षा के लिये चतुर विज्ञानियों के बनाये हुए कवच आदि से सजे हुए सेना, अश्व, रथ आदि के साथ शत्रुओं पर चढ़ाई करे ॥१॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-म० ३।१।४५; यजुः०−२०।५३; साम० पू० ३।६।४ ॥


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    Meaning -
    Come Indra, lord of might and majesty, by your charming peacock-haired horses. Let none whatsoever hold you back, let none catch you with snares like a bird. March on like an exceptional hero of the bow, advance and take the enemies on.


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