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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 45 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 45/ मन्त्र 2
    ऋषिः - प्रस्कण्वः देवता - ईर्ष्यापनयनम् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - ईर्ष्यानिवारण सूक्त
    43

    अ॒ग्नेरि॑वास्य॒ दह॑तो दा॒वस्य॒ दह॑तः॒ पृथ॑क्। ए॒तामे॒तस्ये॒र्ष्यामु॒द्नाग्निमि॑व शमय ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒ग्ने:ऽइ॑व । अ॒स्य॒ । दह॑त: । दा॒वस्य॑ । दह॑त: । पृथ॑क् । ए॒ताम् । ए॒तस्य॑ । ई॒र्ष्याम् । उ॒द्ना । अ॒ग्निम्ऽइ॑व । श॒म॒य॒ ॥४७.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अग्नेरिवास्य दहतो दावस्य दहतः पृथक्। एतामेतस्येर्ष्यामुद्नाग्निमिव शमय ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अग्ने:ऽइव । अस्य । दहत: । दावस्य । दहत: । पृथक् । एताम् । एतस्य । ईर्ष्याम् । उद्ना । अग्निम्ऽइव । शमय ॥४७.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 45; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ईर्ष्या दोष के निवारण का उपदेश।

    पदार्थ

    (अस्य) इस (दहतः) जलती हुई (अग्नेः इव) अग्नि के समान, (पृथक्) अथवा (दहतः) जलती हुई (दावस्य) वन अग्नि के [समान] (एतस्य) इस पुरुष की (एताम्) इस (ईर्ष्याम्) ईर्ष्या को (शमय) शान्त कर दे, (इव) जैसे (उद्ना) जल से (अग्निम्) आग को ॥२॥

    भावार्थ

    ईर्ष्यालु अर्थात् दूसरे के अभ्युदय को न सहनेवाला मनुष्य आग के समान भीतर ही भीतर जल कर राख के समान नाश हो जाता है, इससे वह ईर्ष्या दोष को ऐसा शान्त रक्खे, जैसे अग्नि को जल से ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(अग्नेः) पावकस्य (इव) यथा (अस्य) पुरोवर्तिनः (दहतः) ज्वलतः (दावस्य) टुदु उपतापे-घञ्। वनाग्नेः (दहतः) (पृथक्) भिन्ने। अथवा (एताम्) (एतस्य) ईर्ष्यालोः पुरुषस्य (ईर्ष्याम्) मत्सरबुद्धिम् (उद्ना) अ० ३।१२।४। उदकेन (अग्निम्) (इव) (शमय) शान्तां कुरु ॥

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    विषय

    ईयानि-शमन

    पदार्थ

    १. (अग्नेः इव दहतः) = अग्नि के समान क्रोध से मेरे कार्यों को नष्ट करते हुए (अस्य) = इस पुरोवर्ती ईर्ष्यालु पुरुष तथा (पृथक्) = प्रत्येक पदार्थ को अलग-अलग (दहतः) = भस्म करते हुए (दावस्य) = वनाग्नि के समान (एतस्य) = इस पुरोवर्ती ईर्ष्यालु पुरुष की (एताम् ईयाम्) = इस मद्विषयक ईर्ष्या को उना-जल से (अग्निम् इव) = अग्नि की भाँति (शमय) = शान्त कर दो। जैसे जल से अग्नि को शान्त कर देते हैं, उसी प्रकार इस पुरुष की ईर्ष्या को ज्ञान-जल द्वारा शान्त कर दो।

    भावार्थ

    ईर्ष्या के कारण मनुष्य दूसरे के कार्यों को नष्ट करने में शक्ति का अपव्यय करता है। ज्ञान द्वारा इस ईर्ष्या की अग्नि को इसप्रकार बुझा दिया जाए, जैसेकि जल से अग्नि को बुझा देते हैं।

    ईया आदि को शान्त करके यह स्थिर चित्तवृत्तिवाला 'अथर्वा' बनता है। यह 'अथर्वा' हो अगले चार सूक्तों का ऋषि है। स्थिर चित्तवाले पति-पत्नी का इन मन्त्रों में वर्णन है -

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    भाषार्थ

    (अग्नेः इव) अग्नि के सदृश (दहतः) दग्ध करते हुए (अस्य) इस ईर्ष्यालु के (एताम् ईर्ष्याम्) इस ईर्ष्याभाव को, तथा (पृथक्) इस से भिन्न, (दहतः) दग्ध करती हुई (दावस्य) प्रचण्ड वनाग्नि के सदृश प्रचण्ड (एतस्य) इसके ईर्ष्याभाव को (शमय) हे विश्वजन हितकारी ! तू शान्त कर दे, (इव) जैसे कि (उद्ना) जल द्वारा (अग्निम्) अग्नि को शान्त किया जाता है।

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    विषय

    ईर्ष्या के दूर करने का उपाय।

    भावार्थ

    (उद्ना) जलसे (अग्निम्-इव) जिस प्रकार जलती आग को शान्त कर दिया जाता है उसी प्रकार (अग्नेः-इव दहतः) जलती आग के समान या (दावस्य दहतः) जंगल को जलाती भड़कती आग के समान (दहतः) जलते, कुढ़ते हुए या भयानक रूप में भड़कते हुए (एतस्य) इस ईर्षालु द्रोह वाले चित्त की (ईर्ष्याम्) ईर्षा को प्रेम से या दूसरों के सच्चरित्र गुणों से (शमय) शान्त कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    प्रस्कण्व ऋषिः। ईर्ष्यापनयनम् भेषजं देवता। १, २ अनुष्टुभौ। द्वयृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Removal of Jealousy

    Meaning

    Like fire extinguished by water, calm down the jealousy of this man burning like blazing fire, indeed blazing like forest fire by itself without obstruction. (What could be the antidote or cure: It could be a herb or a learned psychiatrist.)

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    Translation

    May you (O remedy), quell down this jealousy of this man burning like fire and burning each and every thing like a forest-fire, as they quench fire with water.

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.47.1AS PER THE BOOK

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    Translation

    Let this balm calm the jealousy of the man who is burning like fire and burning like the fire of nluge, as the water extinguishes the fire.

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    Translation

    O Knowledge, the averter of fear, brought from a distant person, calm and deep like the ocean, well-wisher of humanity, r deem thee, nicely nourished, a balm that cureth jealousy.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(अग्नेः) पावकस्य (इव) यथा (अस्य) पुरोवर्तिनः (दहतः) ज्वलतः (दावस्य) टुदु उपतापे-घञ्। वनाग्नेः (दहतः) (पृथक्) भिन्ने। अथवा (एताम्) (एतस्य) ईर्ष्यालोः पुरुषस्य (ईर्ष्याम्) मत्सरबुद्धिम् (उद्ना) अ० ३।१२।४। उदकेन (अग्निम्) (इव) (शमय) शान्तां कुरु ॥

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