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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 45 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 45/ मन्त्र 1
    ऋषि: - प्रस्कण्वः देवता - भेषजम् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - ईर्ष्यानिवारण सूक्त
    28

    जना॑द्विश्वज॒नीना॑त्सिन्धु॒तस्पर्याभृ॑तम्। दू॒रात्त्वा॑ मन्य॒ उद्भृ॑तमी॒र्ष्याया॒ नाम॑ भेष॒जम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    जना॑त् । वि॒श्व॒ऽज॒नीना॑त् । सि॒न्धु॒त: । परि॑ । आऽभृ॑तम् । दू॒रात् । त्वा॒ । म॒न्ये॒ । उत्ऽभृ॑तम् । ई॒र्ष्याया॑: । नाम॑ । भे॒ष॒जम् ॥४६.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    जनाद्विश्वजनीनात्सिन्धुतस्पर्याभृतम्। दूरात्त्वा मन्य उद्भृतमीर्ष्याया नाम भेषजम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    जनात् । विश्वऽजनीनात् । सिन्धुत: । परि । आऽभृतम् । दूरात् । त्वा । मन्ये । उत्ऽभृतम् । ईर्ष्याया: । नाम । भेषजम् ॥४६.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 45; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    [हे भयनिवारक ज्ञान !] (सिन्धुतः) समुद्र [के समान गम्भीर स्वभाववाले] (विश्वजनीनात्) सब जनों के हितकारी (जनात्) उनके पास से (दूरात्) दूर देश से (परि) सब प्रकार (आभृतम्) लाये हुए और (उद्भृतम्) उत्तमता से पुष्ट किये हुए (त्वा) तुझको (ईर्ष्यायाः) दाह का (नाम) प्रसिद्ध (भेषजम्) भयनिवारक औषध (मन्ये) मैं मानता हूँ ॥१॥

    भावार्थ - जैसे मनुष्य बहुमूल्य उत्तम औषध को दूर देश से लाते हैं, वैसे ही विद्वान् लोग सर्वहितकारी विद्वानों से ज्ञान प्राप्त करके ईर्ष्या छोड़कर दूसरों की उन्नति में अपनी उन्नति समझें ॥१॥


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    Meaning -
    From a far off people really interested in the good of humanity, from the sea and people with equally broad mind that far, I believe, you have been brought and developed as a sure cure for jealousy.


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