अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 46/ मन्त्र 3
ऋषिः - अथर्वा
देवता - सिनीवाली
छन्दः - त्रिष्टुप्
सूक्तम् - सिनीवाली सूक्त
129
या वि॒श्पत्नीन्द्र॒मसि॑ प्र॒तीची॑ स॒हस्र॑स्तुकाभि॒यन्ती॑ दे॒वी। विष्णोः॑ पत्नि॒ तुभ्यं॑ रा॒ता ह॒वींषि॒ पतिं॑ देवि॒ राध॑से चोदयस्व ॥
स्वर सहित पद पाठया । वि॒श्पत्नी॑ । इन्द्र॑म् । असि॑ । प्र॒तीची॑ । स॒हस्र॑ऽस्तुका । अ॒भि॒ऽयन्ती॑ । दे॒वी । विष्णो॑: । प॒त्नि॒ । तुभ्य॑म् । रा॒ता । ह॒वींषि॑ । पति॑म् । दे॒वि॒ । राध॑से । चो॒द॒य॒स्व॒ ॥४८.३॥
स्वर रहित मन्त्र
या विश्पत्नीन्द्रमसि प्रतीची सहस्रस्तुकाभियन्ती देवी। विष्णोः पत्नि तुभ्यं राता हवींषि पतिं देवि राधसे चोदयस्व ॥
स्वर रहित पद पाठया । विश्पत्नी । इन्द्रम् । असि । प्रतीची । सहस्रऽस्तुका । अभिऽयन्ती । देवी । विष्णो: । पत्नि । तुभ्यम् । राता । हवींषि । पतिम् । देवि । राधसे । चोदयस्व ॥४८.३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
स्त्रियों के गुणों का उपदेश।
पदार्थ
(या) जो (विश्पत्नी) सन्तानों की पालनेवाली, (प्रतीची) निश्चित ज्ञानवाली, (सहस्रस्तुका) सहस्रों स्तुतिवाली, (अभियन्ती) चारों ओर चलती हुई (देवी) देवी तू (इन्द्रम्) ऐश्वर्य को (असि=अससि) ग्रहण करती है। (विष्णोः) पत्नि) हे कामों में व्यापक वीर पुरुष की पत्नी ! (तुभ्यम्) तेरे लिये (हवींषि) देने योग्य पदार्थ (राता) दिये गये हैं, (देवि) हे देवी ! (पतिम्) अपने पति को (राधसे) सम्पत्ति के लिये (चोदयस्व) आगे बढ़ा ॥३॥
भावार्थ
स्त्रियाँ गृहकार्य में चतुर रह कर अपने पतियों द्वारा धनसंचय कराकर सन्तान पालन आदि कार्य करती रहें ॥३॥
टिप्पणी
३−(या) (विश्पत्नी) प्रजानां पालयित्री (इन्द्रम्) ऐश्वर्यम् (असि) अस ग्रहणे। अससि गृह्णासि (प्रतीची) अ० ७।३८।३। निश्चितज्ञानयुक्ता। (सहस्रस्तुका) म० १। ष्टुञ्-कक्। असंख्यस्तुतियुक्ता (अभियन्ती) अभितो गच्छन्ती (देवी) व्यवहारकुशला (विष्णोः) कार्येषु व्यापकस्य पत्युः (पत्नि) (तुभ्यम्) (राता) दत्तानि (हवींषि) दातव्यानि वस्तूनि (पतिम्) स्वामिनम् (देवि) (राधसे) धनाय-निघ० २।१०। (चोदयस्व) प्रेरयस्व। प्रगमय ॥
विषय
इन्द्र प्रतीची अभियन्ती देवी
पदार्थ
१. (या विश्पत्नी) = जो प्रजाओं का पालन करनेवाली तू (इन्द्रं प्रतीची असि) = जितेन्द्रिय पति के अभिमुख प्राप्त होनेवाली है, वह तु (सहस्त्रस्तुका) = सहस्रों स्तुतियोंवाली, खूब ही प्रभुस्तवन करनेवाली (अभियन्ती) = कर्तव्य-कर्मों की ओर गतिवाली (देवी) = प्रकाशमय जीवनवाली है। २. हे (विष्णो: पत्नि) = उदार-हृदयवाले पति की पत्नि! (तुभ्यं हवींषि राता) = तेरे लिए सब हव्य पदार्थ इस पति द्वारा प्राप्त कराये गये हैं। हे (देवि) = दिव्य गुणों को धारण करनेवाली पत्नि! तु (पतिम्) = पति को (राधसे) = सिद्धि के लिए, कार्यों में सफलता के लिए अथवा ऐश्वर्य के लिए (चोदयस्व) = प्रेरित कर।
भावार्थ
पत्नी पति के लिए अनुकूल हो, प्रभुस्तवनपूर्वक कार्यों में प्रवृत्त होनेवाली व प्रकाशमय जीवनवाली हो। यह सदा उदार हृदय पति को ऐश्वर्य के लिए प्रेरित करनेवाली होती
भाषार्थ
(सहस्रस्तुका) हजारों बालों के केशगुच्छे वाली, (अभियन्ती) [विवाह निमित्त] यज्ञशाला की ओर आती हुई, (या) जो (विश्पत्नी देवी) तू वैश्यपत्नी देवी (इन्द्रम्) वैश्यपति (प्रतीची) के प्रति आती है, वह तू (विष्णोः पत्नि) हे [व्यापारार्थ] सर्वत्र जाने वाले पति की पत्नी! (तुभ्यम्) तुझे (हवींषि) अन्न के भण्डार (राता= रातानि) दिये हैं, सौंप दिये हैं, (देवि) हे देवि ! (पतिम्) पति को (राधसे) धनोपार्जन के लिये (चोदयस्व) प्रेरित करती रह।
टिप्पणी
[इन्द्र= वणिक्, वैश्य। यथा “इन्द्रमहं वणिजं चोदयामि" (अथर्व० ३।१५।१), ३।१५ का यह समग्र सूक्त व्यापारपरक है। इस द्वारा सवर्णी विवाह का निर्देश हुआ है, पति भी इन्द्र अर्थात् वणिक् है और पत्नी भी वैश्यवर्ण की है। पति को व्यापारार्थ देश विदेश जाना पड़ता है अतः इसे विष्णु कहा है " विष्लृ व्याप्तौ" व्यापारार्थ इस की सर्वत्र व्याप्ति होती है, विविध स्थानों में प्राप्ति होती है। अतः पति के कृषिजन्य-हवियों के प्रबन्ध का अधिकार पत्नी को सौंपा गया है। अथर्व० ३।१५ में वणिक् को हवाई जहाजों द्वारा व्यापारार्थ देश विदेश जाने का भी निर्देश दिया है, और कहा है कि "यथा क्रीत्वा धनमाहराणि" (३।१५।२), कि "खरीद कर मैं धन लाऊं"। अथर्व० ३।१५ का समग्र सूक्त पठनीय है]।
विषय
सभा पृथिवी और स्त्री का वर्णन।
भावार्थ
हे (देवि) देवि ! पति की कामना करने वाली ! तू अपने (पतिम्) पति को (राधसे) धन और यश प्राप्त करने के लिए (चोदयस्व) प्रेरित कर। उसी प्रकार हे (विष्णोः पत्नि) व्यापक सार्वभौम राजा या तेरे हृदय में व्यापक प्रियतम की (पत्नि) पालिके ! राजसभे ! (तुभ्यम्) तेरे निमित्त तुझे (हवींषि) पर्याप्त साधन और अधिकार (राता) प्रदान किये गये हैं। यह (विश्पत्नी) पूर्वोक्त प्रजातन्त्र शासन की वह प्रतिनिधि सभा है. (या) जो (देवी) विद्वानों की बनी हुई है, और (सहस्र-स्तुका) सहस्रों संघों को अपने भीतर मिलाये हुए (अभि-यन्ती) प्रकट होती हुई. (इन्द्रं) राजा या पति के भी (प्रतीची) सन्मुख उसके समान शक्ति वाली (असि) है। ऐसी है (पत्नि) गृहपालिके, राष्ट्रपालिके, जन-राजसभे ! तू अपने (पति) पति, सभापति या राष्ट्रपति को (राधसे) पुत्र, यश और अर्थ प्राप्ति के लिए न्यायमार्ग में (चोदयस्व) प्रेरित कर। ‘नाविष्णुः पृथिवीपतिः’ इस पुरानी किंवदन्ती का यही मन्त्र मूल है। राजा को वेद ‘विष्णु’ कहता है। वह ‘विपत्नी’ का पति है। इन्द्र राजा है और विष्णु राष्ट्रसभा का सभापति है। वह पूर्व अमावस्या का वर्णन हुआ। अमावास्या नाम स्त्री का है अमा=सह वसते पत्या इति अमावास्या। जो पति के साथ रहे। ‘अमा’ एक साथ जिसमें सब प्रजाएं ‘वास्या’ बैठ सके। जनरल कान्फ्रेन्स, महासभा, साधारण सभा।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। विश्पत्नी देवता। १, २ अनुष्टुप्। ३ त्रिष्टुप्। तृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Gift of Fertility
Meaning
O Sinivali, mother of the nation’s children, first and only lady of Indra, master of the home, celebrated by thousands, divine spirit moving forward, favourite sustainer of Vishnu, yajnic system of the family institution, we offer you gifts of love and homage of sanctity. O Spirit of divine fertility, inspire your husband for the achievement of success, prosperity and excellence of life.
Translation
To you, who are sustainer of the people, and who are inclined towards the resplendent one, glowing, praised by thousands, and coming forward, O consort of the sacrifice, (these) oblations are offered. May you urge your husband, O glowing one, to grant us wealth,
Comments / Notes
MANTRA NO 7.48.3AS PER THE BOOK
Translation
This first part of dark-night which protect the worldly subject, which is different from full dark-night, coming towards Sun is praised by all and is the wondrous phenomenon of the world. It is the Patni, the guarding factor of yajna and oblation is offered for it, let it make the yajna effective in giving bounty.
Translation
Always supply food to the lovely wife, the nourisher of children, lovely armed, beautiful-fingured, prolific, bearing many a child.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
३−(या) (विश्पत्नी) प्रजानां पालयित्री (इन्द्रम्) ऐश्वर्यम् (असि) अस ग्रहणे। अससि गृह्णासि (प्रतीची) अ० ७।३८।३। निश्चितज्ञानयुक्ता। (सहस्रस्तुका) म० १। ष्टुञ्-कक्। असंख्यस्तुतियुक्ता (अभियन्ती) अभितो गच्छन्ती (देवी) व्यवहारकुशला (विष्णोः) कार्येषु व्यापकस्य पत्युः (पत्नि) (तुभ्यम्) (राता) दत्तानि (हवींषि) दातव्यानि वस्तूनि (पतिम्) स्वामिनम् (देवि) (राधसे) धनाय-निघ० २।१०। (चोदयस्व) प्रेरयस्व। प्रगमय ॥
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