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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 65 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 65/ मन्त्र 2
    ऋषिः - शुक्रः देवता - अपामार्गवीरुत् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - दुरितनाशन सूक्त
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    यद्दु॑ष्कृ॒तं यच्छम॑लं॒ यद्वा॑ चेरिम पा॒पया॑। त्वया॒ तद्वि॑श्वतोमु॒खापा॑मा॒र्गाप॑ मृज्महे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यत् । दु॒:ऽकृ॒तम् । यत् । शम॑लम् । यत् । वा॒ । चे॒रि॒म । पा॒पया॑ । त्वया॑ । तत् । वि॒श्व॒त॒:ऽमु॒ख॒ । अपा॑मार्ग । अप॑ । मृ॒ज्म॒हे॒ ॥६७.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यद्दुष्कृतं यच्छमलं यद्वा चेरिम पापया। त्वया तद्विश्वतोमुखापामार्गाप मृज्महे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यत् । दु:ऽकृतम् । यत् । शमलम् । यत् । वा । चेरिम । पापया । त्वया । तत् । विश्वत:ऽमुख । अपामार्ग । अप । मृज्महे ॥६७.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 65; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    वैद्य के कर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (यत्) जो कुछ (दुष्कृतम्) दुष्कर्म (यद् वा) अथवा (यत्) जो कुछ (शमलम्) मलिन कर्म (पापया) पाप बुद्धि से (चेरिम) हमने किया है। (विश्वतोमुख) हे सब ओर मुख रखनेवाले ! [अतिदूरदर्शी] (अपामार्ग) हे सर्वथा संशोधक ! (त्वया) तेरे साथ (तत्) उसको (अप मृज्महे) हम शोधते हैं ॥२॥

    भावार्थ

    मनुष्य दुष्कर्म और मलिनकर्म से उत्पन्न रोगों को सद्वैद्य की सम्मति से औषध द्वारा निवृत्त करें ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(यत्) यत् किञ्चित् (दुष्कृतम्) दुष्कर्म (यत्) (शमलम्) अ० ४।९।६। मालिन्यम् (यद् वा) अथवा (चेरिम) चर गतिभक्षणयोः-लिट्। वयं कृतवन्तः (पापया) पापबुद्ध्या (त्वया) (तत्) दुष्कृतं शमलं वा (विश्वतोमुख) सर्वदिङ्मुख। अतिदूरदर्शिन् (अपामार्ग) म० १। सर्वथा संशोधक (अप मृज्महे) सर्वथा शोधयामः ॥

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    विषय

    प्रभु-स्मरण से तामस् व राजस् वृत्तियों का निराकरण

    पदार्थ

    १. (यत् दुष्कृतम्) = जिस दुष्कृत, अशुभ कर्म को हम (चेरिम) = कर बैठते हैं, (यत् शमलम्) = जिस मलिन कलंकजनक घृणित कार्य को कर बैठते हैं, यत् वा अथवा जिस भी अशुभ कर्म को (पापया) = अशुभ [पापमयी] वृत्ति से कर डालते हैं, हे (विश्वतोमुख) = सब ओर मुखोंवाले, सर्वद्रष्ट: ! (अपामार्ग) = हमारे जीवनों के शोधक प्रभो! (त्वया) = आपके द्वारा, आपके स्मरण से हम (तत् अपमज्महे) = उसे सुदूर विनष्ट करते हैं। ३. (यत्) = जो (श्यावदता) = काले [मलिन] दाँतोंवाले (कुनखिना) = कुत्सित नखोंवाले (बण्डेन सह) [बडि विभाजने] = भग्नांग व फूट डालनेवाले, चुगलखोर पुरुष के साथ (आसिम) = हम बैठे और उससे प्रभावित हो कुछ ऐसे ही बनने लगें तो हे (अपामार्ग) = हमारे जीवनों के शोधक प्रभो! (वयम्) = हम (सर्व तत्) = उस अशुभवृत्ति को (त्वया) = आपके स्मरण से (अपमृमहे) = अपने से दूर करते हैं।

    भावार्थ

    प्रभु-स्मरण से सब दुष्कृत, पाप व अशुभवृत्तियाँ दूर हो जाती हैं। मैले-कुचैले तमोगुणी पुरुषों के साथ अथवा फूट डालनेवाले, चुगली करनेवाले तमोगुणी पुरुषों के संग में आ जानेवाले दोषों को हम प्रभु की उपासना के द्वारा दूर कर सकते हैं।

    सब पापों से रहित यह श्रेष्ठ सत्त्वगुणवाला पुरुष ब्रह्मा' बनता है। अगले दो सूक्तों का ऋषि यही है -

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    भाषार्थ

    (यत्) जो (दुष्कृतम्) दुष्टकर्म, (यत्) जो (शमलम्) शान्तिनाशक मलिन पाप, (यत् वा) या जो (पापया) पापिन स्त्री के संग (चेरिम) हम विचरे हैं, (विश्वतोमुख१) हे सब ओर मुखवाली (अपामार्ग) अपामार्ग औषध ! (त्वया) तुझ द्वारा (तत्) उस सब दोष को (अपमृज्महे) हम दूर कर शुद्ध कर देते हैं। शमलम्=शम् (शान्ति) + अलम् (वारणम्, भ्वादिः)

    टिप्पणी

    [१. सर्वतः प्रसृतशाखायुक्त ! (सायण)।]

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    विषय

    पापनिवारक ‘अपामार्ग’ का स्वरूप वर्णन।

    भावार्थ

    हम (पापया) पापकारिणी प्रवृत्ति से प्रेरित होकर (यद्) जो (दुष्कृतं) दुष्ट काम और (यत् शमलं) जो मलिन, कलंक-जनक, घृणित कार्य (यद् वा) अथवा अन्य भी जो कुछ (चेरिम) करते हैं, हे (अपामार्ग) पापों को दूरने हारे प्राण ! (तत्) उसको (त्वया) तेरे बल से, हे (विश्वतः-मुख) सर्वतोमुख ! अर्थात् सब शरीर में व्याप्त होने वाले ! (अप मृज्महे) हम दूर करते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    दुरितापमृष्टिप्रार्थी शुक्र ऋषिः। अपामार्गवीरुद् देवता। अनुष्टुप छन्दः। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Apamarga Herb

    Meaning

    Whatever evil, dirty or sinful act we have done and suffer, O Apamarga, all-cure versatile, we wash off by you.

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    Translation

    Whatever mis-deed, whatever mis-conduct, or whatever act we have done with evil design, that we wipe-off with you, O apamarga, having forces in all directions.

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.67.2AS PER THE BOOK

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    Translation

    With this Apamarga which is effective in various diseases we drive a far whatever troublesome whatever bad and whatever other diseases we have developed by violating the law of nature and hygiene.

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    Translation

    Whatever evil or whatever vile or sinful act we have done, with thy help, O Prana, the remover of sin and pervader in the body, we wipe it off.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(यत्) यत् किञ्चित् (दुष्कृतम्) दुष्कर्म (यत्) (शमलम्) अ० ४।९।६। मालिन्यम् (यद् वा) अथवा (चेरिम) चर गतिभक्षणयोः-लिट्। वयं कृतवन्तः (पापया) पापबुद्ध्या (त्वया) (तत्) दुष्कृतं शमलं वा (विश्वतोमुख) सर्वदिङ्मुख। अतिदूरदर्शिन् (अपामार्ग) म० १। सर्वथा संशोधक (अप मृज्महे) सर्वथा शोधयामः ॥

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