अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 65/ मन्त्र 3
ऋषिः - शुक्रः
देवता - अपामार्गवीरुत्
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - दुरितनाशन सूक्त
54
श्या॒वद॑ता कुन॒खिना॑ ब॒ण्डेन॒ यत्स॒हासि॒म। अपा॑मार्ग॒ त्वया॑ व॒यं सर्वं॒ तदप॑ मृज्महे ॥
स्वर सहित पद पाठश्या॒वऽद॑ता । कु॒न॒खिना॑ । ब॒ण्डेन॑ । यत् । स॒ह । आ॒सि॒म । अपा॑मार्ग । त्वया॑ । व॒यम् । सर्व॑म् । तत् । अप॑ । मृ॒ज्म॒हे॒ ॥६७.३॥
स्वर रहित मन्त्र
श्यावदता कुनखिना बण्डेन यत्सहासिम। अपामार्ग त्वया वयं सर्वं तदप मृज्महे ॥
स्वर रहित पद पाठश्यावऽदता । कुनखिना । बण्डेन । यत् । सह । आसिम । अपामार्ग । त्वया । वयम् । सर्वम् । तत् । अप । मृज्महे ॥६७.३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
वैद्य के कर्म का उपदेश।
पदार्थ
(श्यावदता) काले दाँतवाले, (कुनखिना) दूषित नखवाले (बण्डेन) बण्डे [टेढ़े-मेढ़े अङ्गवाले रोगी] के (सह) साथ (यत्) जो (आसिम) रहे हैं। (अपामार्ग) हे सर्वथा संशोधक ! [वैद्य वा अपामार्ग औषध !] (त्वया) तेरे साथ (वयम्) हम (तत् सर्वम्) उस सबको (अप मृज्महे) शोधते हैं ॥३॥
भावार्थ
यदि रोग की व्याकुलता से शरीर अङ्गभङ्ग हो जावे, उसे ओषधि द्वारा स्वस्थ करें ॥३॥
टिप्पणी
३−(श्यावदता) विभाषा श्यावारोकाभ्यां च पा०। पा० ५।४।१४४। श्यावपदादुत्तरस्य दन्तस्य दतृ इत्यादेशः। कृष्णदन्तयुक्तेन (कुनखिना) दूषितनखयुक्तेन (बण्डेन) बडि विभाजने, वेष्टने च-अच्। विकलाङ्गेन (यत्) (सह) (आसिम) अस भुवि-लङ्, इत्वं छान्दसम्। आस्म। अभवाम। अन्यत् स्पष्टम् ॥
विषय
प्रभु-स्मरण से तामस् व राजस् वृत्तियों का निराकरण
पदार्थ
१. (यत् दुष्कृतम्) = जिस दुष्कृत, अशुभ कर्म को हम (चेरिम) = कर बैठते हैं, (यत् शमलम्) = जिस मलिन कलंकजनक घृणित कार्य को कर बैठते हैं, यत् वा अथवा जिस भी अशुभ कर्म को (पापया) = अशुभ [पापमयी] वृत्ति से कर डालते हैं, हे (विश्वतोमुख) = सब ओर मुखोंवाले, सर्वद्रष्ट: ! (अपामार्ग) = हमारे जीवनों के शोधक प्रभो! (त्वया) = आपके द्वारा, आपके स्मरण से हम (तत् अपमज्महे) = उसे सुदूर विनष्ट करते हैं। ३. (यत्) = जो (श्यावदता) = काले [मलिन] दाँतोंवाले (कुनखिना) = कुत्सित नखोंवाले (बण्डेन सह) [बडि विभाजने] = भग्नांग व फूट डालनेवाले, चुगलखोर पुरुष के साथ (आसिम) = हम बैठे और उससे प्रभावित हो कुछ ऐसे ही बनने लगें तो हे (अपामार्ग) = हमारे जीवनों के शोधक प्रभो! (वयम्) = हम (सर्व तत्) = उस अशुभवृत्ति को (त्वया) = आपके स्मरण से (अपमृमहे) = अपने से दूर करते हैं।
भावार्थ
प्रभु-स्मरण से सब दुष्कृत, पाप व अशुभवृत्तियाँ दूर हो जाती हैं। मैले-कुचैले तमोगुणी पुरुषों के साथ अथवा फूट डालनेवाले, चुगली करनेवाले तमोगुणी पुरुषों के संग में आ जानेवाले दोषों को हम प्रभु की उपासना के द्वारा दूर कर सकते हैं।
सब पापों से रहित यह श्रेष्ठ सत्त्वगुणवाला पुरुष ब्रह्मा' बनता है। अगले दो सूक्तों का ऋषि यही है -
भाषार्थ
(श्यावदता) श्याव दाँत वाले, (कुनखिना) विकृत नखों वाले, (बण्डेन) गलिताङ्ग वाले पुरुष के (सह) साथ (यत्) जो (आसिम या आशिम) हम उठे-बैठे या खाए-पिए हैं, (अपामार्ग) हे शोधन करने वाली अपामार्ग औषध (त्वया) तुझ द्वारा (तत् सर्वम्) उस सब [दोष] को (वयम्) हम (अपमृज्महे) पृथक् कर शुद्ध कर देते हैं।
टिप्पणी
[श्यावदता = श्याव और कृष्ण वर्ण में भेद है। श्याव= कुछ कालिमा वाला भूरा (Darkbrown), मटियाला (Dusty) ; भूरा (Brown); [आप्टे]। बण्डेन= बडि विभाजने (भ्वादिः, चुरादिः)। मन्त्र में विभाजन का अभिप्राय है विभक्त हो जाना, टूटकर अलग हो जाना, अङ्ग का कट जाना। मन्त्रकथित रोगी कुष्ठ रोगी है। कुष्ठ leprosy। कुष्ठ १८ प्रकार का होता है (आप्टे)। विगलत्कुष्ठ में अंगुलियों तथा पैरों के अङ्ग गलकर टूट जाते हैं। कुष्ठ रोग संक्रामक (Contageous) भी होता है। अतः कुष्ठरोगी के साथ बैठना या खाना हानिकारक है। आशिम (सायण)। दाँतों में वर्ण विकृति तथा नखों की विकृति- यह भी एक प्रकार का कुष्ठ है। अपामार्ग औषध कुष्ठनिवारक है यह मन्त्र से प्रतीत होता है]।
विषय
पापनिवारक ‘अपामार्ग’ का स्वरूप वर्णन।
भावार्थ
(यत्) और जो (श्याव-दता) काले दांत वाले, मलिन मुख, दन्तधावन न करने वाले, व्यसन से मलिन पदार्थ अर्थात् मांस आदि को खाने वाले, (कु-नखिना) बुरे नखों वाले, (बण्डेन*) और लड़ाके या परस्पर फूट डालने वाले, चुगल खोर के साथ (आसिम) बैठें तो हे (अपमार्ग) पापों को दूर करने हारे ! (त्वया) तेरे बल पर (तत् सर्वं) उस सब दुष्प्रभाव को (अप मृज्महे) हम दूर करें।
टिप्पणी
*बण्डेन नपुंसकेनेति सायणः। भग्नाङ्ग इति ह्विटनिः, बडि विभाजने इति धातोः पचाद्यच्। बण्डो विभाजकः।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
दुरितापमृष्टिप्रार्थी शुक्र ऋषिः। अपामार्गवीरुद् देवता। अनुष्टुप छन्दः। तृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Apamarga Herb
Meaning
Whether we suffer from black teeth, deformed nails, or crooked limbs, we ward off all that by you, Apamarga.
Translation
If we have lived with an important person, having black teeth (syava-data) and bad nails (kunakhina), all that (guilt thus acquired), we wipe off with you, O apamarga.
Comments / Notes
MANTRA NO 7.67.3AS PER THE BOOK
Translation
With this apamarga we remove away all those diseases which we have developed in living with cripple who has black teeth and deformed nails.
Translation
If we have dined with the cripple, whose teeth are black and nails deformed, with thee, O Apamarga, we wipe all that ill away from-us.
Footnote
Apamarga: A medicine that cures contagious diseases. Cripple: Lame and hideous personage, the embodiment of disease.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
३−(श्यावदता) विभाषा श्यावारोकाभ्यां च पा०। पा० ५।४।१४४। श्यावपदादुत्तरस्य दन्तस्य दतृ इत्यादेशः। कृष्णदन्तयुक्तेन (कुनखिना) दूषितनखयुक्तेन (बण्डेन) बडि विभाजने, वेष्टने च-अच्। विकलाङ्गेन (यत्) (सह) (आसिम) अस भुवि-लङ्, इत्वं छान्दसम्। आस्म। अभवाम। अन्यत् स्पष्टम् ॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
Misc Websites, Smt. Premlata Agarwal & Sri Ashish Joshi
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
Sri Amit Upadhyay
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
Sri Dharampal Arya
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal