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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 95 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 95/ मन्त्र 2
    ऋषिः - कपिञ्जलः देवता - गृध्रौ छन्दः - भुरिगनुष्टुप् सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
    63

    अ॒हमे॑ना॒वुद॑तिष्ठिपं॒ गावौ॑ श्रान्त॒सदा॑विव। कु॑र्कु॒रावि॑व॒ कूज॑न्तावु॒दव॑न्तौ॒ वृका॑विव ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒हम् । ए॒नौ॒ । उत् । अ॒ति॒ष्ठि॒प॒म् । गावौ॑ । श्रा॒न्त॒सदौ॑ऽइव । कु॒र्कु॒रौऽइ॑व । कूज॑न्तौ । उ॒त्ऽअव॑न्तौ । वृकौ॑ऽइव ॥१००.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अहमेनावुदतिष्ठिपं गावौ श्रान्तसदाविव। कुर्कुराविव कूजन्तावुदवन्तौ वृकाविव ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अहम् । एनौ । उत् । अतिष्ठिपम् । गावौ । श्रान्तसदौऽइव । कुर्कुरौऽइव । कूजन्तौ । उत्ऽअवन्तौ । वृकौऽइव ॥१००.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 95; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    काम और क्रोध के निवारण का उपदेश।

    पदार्थ

    (अहम्) मैंने (एनौ) इन दोनों को (उत् अतिष्ठिपम्) उठा दिया है, (इव) जैसे (श्रान्तसदौ) थक कर बैठे हुए (गावौ) दो बैलों को, (इव) जैसे (कूजन्तौ) घुरघुराते हुए (कुर्कुरौ) [कुर-कुर करनेवाले] कुत्तों को, और (इव) जैसे (उदयन्तौ) दो घुस आनेवाले (वृकौ) भेड़ियों को ॥२॥

    भावार्थ

    मनुष्य काम क्रोध रूप शत्रुओं को विचारपूर्वक तुरन्त हटावें ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(अहम्) विद्वान् (एनौ) पूर्वोक्तौ गृध्रौ कामक्रोधौ (उदतिष्ठिपम्) तिष्ठतेर्ण्यन्ताल् लुङि चङि रूपम्। उत्थापितवानस्मि। अपसारितवानस्मि (गावौ) वृषभौ (श्रान्तसदौ) श्रान्तौ श्रमवन्तौ सीदन्तौ निषीदन्तौ (कुर्कुरौ) कुर शब्दे-क्विप्+कुर शब्दे-क। कुरमिति शब्दं कुर्वन्तौ श्वानौ (इव) (कूजन्तौ) ध्वनिं कुर्वन्तौ (उदवन्तौ) अव प्रवेशे-शतृ। उद्गत्य प्रविशन्तौ (वृकौ) अ० ४।३।१। अरण्यश्वानौ (इव) ॥

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    विषय

    कुकुरौ इव, वृकौ इव

    पदार्थ

    १. (अहम्) = मैं (एतौ) = इन दोनों काम-क्रोधरूप शत्रुओं को (उदतिष्ठिपम्) = उत्थापित करता हूँ, बल से इनको बाहर निकालता हूँ, उसी प्रकार (इव) = जैसेकि (श्रान्तसदौ गावौ) = थकावट के कारण बैठे हुए दो बैलों को एक किसान दण्डपातादि द्वारा बलपूर्वक उठाता है। अथवा (कूजन्तौ कुकुरौ इव) = जैसे भौंकते हुए दो कुत्तों को पाषाण के प्रहारादि से अपसारित करते हैं, (उद् अवन्तौ वकी इव) = जैसे गोयूथ में से बछड़ों को उठाकर ले जाते हुए भेड़ियों को ग्वाले दूर भगाते हैं।

    भावार्थ

    ये काम-क्रोध भौंकते हुए कुत्तों के समान हैं, बछड़ों को उठाकर ले-जानेवाले भेड़ियों के समान हैं। इन्हें दूर भगाना आवश्यक है। जैसे किसान जमकर बैठे हुए दो बैलों को दण्डप्रहार से उठाकर गोष्ट से बाहर करता है, इसी प्रकार इन काम-क्रोध को हृदय से बाहर करना आवश्यक है।

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    भाषार्थ

    (अहम्) मैंने (एनौ) इन दोनों "लोभ-मोह" को (उदतिष्ठिपम्) इस के हृदय और मस्तिष्क से उठा दिया है [बहिष्कृत कर दिया है], (इव) जैसे कि (श्रान्तसदौ) थककर बैठी (गावौ) दो गोओं को, (इव) जैसे (कूजन्तौ) घुरघुराते (कुर्कुरौ) दो कुत्तों को तथा (इव) जैसे (उदवन्तौ) मुख में लाररूपी उदक वाले (वृको) दो भेड़ियों को जबरदस्ती उठा दिया जाता है।

    टिप्पणी

    [मन्त्र में प्रवक्ता है अध्यात्मशक्तिसम्पन्न व्यक्ति, जो कि निज दृढ़ मनोभावना द्वारा लोभ-मोह को हृदय और मस्तिष्क से बहिष्कृत कर देता है, उठा देता है। तीन दृष्टान्तों द्वारा लोभ-मोह के तारतम्य को सूचित किया है। गौ, कुत्ते, तथा वृक में उत्तरोत्तर लोभ-मोह की मात्रा अधिक बढ़ती जाती है। कुत्ते के खाने के लोभ को Canina-Hunger द्वारा प्रकट किया जाता है। तथा वृक के लोभ-लालच को "उदवन्तौ" द्वारा मन्त्र में सूचित किया है, जिस के मुख से खाने के लिये लार बहती रहती है]।

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    विषय

    जीव के आत्मा और मनकी ऊर्ध्वगति।

    भावार्थ

    (श्रान्तसदौ गावौ इव) थककर या हारकर बैठे हुए बैलों को जिस प्रकार उनका गाड़ीवान् पुनः उनकी पूंछ मरोड़कर फिर उठाता है, और जिस प्रकार (कूजन्तौ) गुर्राते हुए (कुर्कुरौ-इव) कुत्ते ऊपर को उछलते हैं, और जिस प्रकार (उत्-अवन्तौ) ऊपर को झपटते हुए (वृकौ-इव) भेड़िये उछलते हैं, उसी प्रकार, (अहं) मैं परमात्मा, शरीर के जीर्ण हो जाने पर (एनौ) इन दोनों जीव और मन को (उत्-अतिष्ठिपम्) उपर को बैंच लेता हूं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कपिञ्जल ऋषिः। गृध्रौ देवते। अनुष्टुप् छन्दः। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Vultures of the Mind

    Meaning

    I have settled these two like two cows resting in the stall, controlled them like two growling dogs, like two ferocious wolves.

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    Translation

    I have made those two to get up (and go away) like two bullocks resting after tiresome toil, like two snailing dogs, or like two prowling wolves (in search of prey)

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.100.2AS PER THE BOOK

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    Translation

    I (when absorbed in the worldly attachment) verily stir them up like the two oxen resting after great toil, like two barking dogs, and like two volves who enters the house violently.

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    Translation

    I banish lust and anger, as a peasant makes the exhausted, resting oxen stand up by pulling their tail, just as two loud-snarling curs are stoned to run away, or as a cowherd drives away the two wolves that attack his cows.

    Footnote

    I refers to a learned person.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(अहम्) विद्वान् (एनौ) पूर्वोक्तौ गृध्रौ कामक्रोधौ (उदतिष्ठिपम्) तिष्ठतेर्ण्यन्ताल् लुङि चङि रूपम्। उत्थापितवानस्मि। अपसारितवानस्मि (गावौ) वृषभौ (श्रान्तसदौ) श्रान्तौ श्रमवन्तौ सीदन्तौ निषीदन्तौ (कुर्कुरौ) कुर शब्दे-क्विप्+कुर शब्दे-क। कुरमिति शब्दं कुर्वन्तौ श्वानौ (इव) (कूजन्तौ) ध्वनिं कुर्वन्तौ (उदवन्तौ) अव प्रवेशे-शतृ। उद्गत्य प्रविशन्तौ (वृकौ) अ० ४।३।१। अरण्यश्वानौ (इव) ॥

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