अथर्ववेद - काण्ड 19/ सूक्त 24/ मन्त्र 1
सूक्त - अथर्वा
देवता - मन्त्रोक्ताः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - राष्ट्रसूक्त
येन॑ दे॒वं स॑वि॒तारं॒ परि॑ दे॒वा अधा॑रयन्। तेने॒मं ब्र॑ह्मणस्पते॒ परि॑ रा॒ष्ट्राय॑ धत्तन ॥
स्वर सहित पद पाठयेन॑। दे॒वम्। स॒वि॒तार॑म्। परि॑। दे॒वाः। अधा॑रयन्। तेन॑। इ॒मम्। ब्र॒ह्म॒णः॒। प॒ते॒। परि॑। रा॒ष्ट्राय॑। ध॒त्त॒न॒ ॥२४.१॥
स्वर रहित मन्त्र
येन देवं सवितारं परि देवा अधारयन्। तेनेमं ब्रह्मणस्पते परि राष्ट्राय धत्तन ॥
स्वर रहित पद पाठयेन। देवम्। सवितारम्। परि। देवाः। अधारयन्। तेन। इमम्। ब्रह्मणः। पते। परि। राष्ट्राय। धत्तन ॥२४.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 24; मन्त्र » 1
भाषार्थ -
(येन) जिस विधि से (देवाः) द्योतमान ग्रह आदि ने (देवम्) द्योतमान (सवितारम्) ग्रहों आदि के उत्पादक और प्रेरक ऐश्वर्यशाली सूर्य को (परि) सब प्रकार से (अधारयन्) नियत स्थान में धारित किया हुआ है, (तेन) उस विधि से (ब्रह्मणस्पते) हे वेदों के विद्वान्! आप, तथा हे अन्य राष्ट्रदेवो! (इमम्) इस सम्राट् को (राष्ट्राय) भूमण्डलव्यापी राष्ट्र के प्रबन्ध के लिए (परि) सब प्रकार से (धत्तन) धारित करो।
टिप्पणी -
[येन—ग्रह आदि और सूर्य पारस्परिक आकर्षण-शक्ति द्वारा एक-दूसरे को धारण किये हुए हैं। इसी प्रकार प्रजावर्ग और राजवर्ग में पारस्परिक स्नेहाकर्षण होना चाहिए। तभी राज्य का प्रबन्ध उत्तम हो सकता है, और शासन में स्थिरता आ सकती है।]