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अथर्ववेद > काण्ड 6 > सूक्त 133

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 133/ मन्त्र 5
    सूक्त - अगस्त्य देवता - मेखला छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - मेखलाबन्धन सूक्त

    यां त्वा॒ पूर्वे॑ भूत॒कृत॒ ऋष॑यः परिबेधि॒रे। सा त्वं परि॑ ष्वजस्व॒ मां दी॑र्घायु॒त्वाय॑ मेखले ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    याम् । त्वा॒ । पूर्वे॑ । भू॒त॒ऽकृत॑: । ऋष॑य: । प॒रि॒ऽबे॒धि॒रे । सा । त्वम् । परि॑ । स्व॒ज॒स्व॒ । माम् । दी॒र्घा॒यु॒ऽत्वाय॑ । मे॒ख॒ले॒ ॥१३३.५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यां त्वा पूर्वे भूतकृत ऋषयः परिबेधिरे। सा त्वं परि ष्वजस्व मां दीर्घायुत्वाय मेखले ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    याम् । त्वा । पूर्वे । भूतऽकृत: । ऋषय: । परिऽबेधिरे । सा । त्वम् । परि । स्वजस्व । माम् । दीर्घायुऽत्वाय । मेखले ॥१३३.५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 133; मन्त्र » 5

    भाषार्थ -
    (याम् त्वा) जिस तुझ को (पूर्व) पूर्वकाल के, (भूतकृतः) सत्स्वरूप परमेश्वर द्वारा निर्दिष्ट कर्तव्य का पालन करने वाले (ऋषयः) ऋषियों ने (परि बेधिरे) कटि भाग के चारों ओर बांधा, (सा) वह (त्वम्) तूं (मेखले) हे मेखला ! (माम्) मुझे (परिष्वजस्व) कटिभाग के चारों ओर आलिङ्गित कर, (दीर्घायुत्वाय) मेरी दीर्घ आयु के लिये।

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