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अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 6/ मन्त्र 3
सु॒त्रामा॑णं पृथि॒वीं द्याम॑ने॒हसं॑ सु॒शर्मा॑ण॒मदि॑तिं सु॒प्रणी॑तिम्। दैवीं॒ नावं॑ स्वरि॒त्रामना॑गसो॒ अस्र॑वन्ती॒मा रु॑हेमा स्व॒स्तये॑ ॥
स्वर सहित पद पाठसु॒ऽत्रामा॑णम् । पृ॒थि॒वीम् । द्याम् । अ॒ने॒हस॑म् । सु॒ऽशर्मा॑णम् । अदि॑तिम् । सु॒ऽप्रणी॑तिम् । दैवी॑म् । नाव॑म् । सु॒ऽअ॒रि॒त्राम् । अना॑गस: । अस्र॑वन्तीम् । आ । रु॒हे॒म॒ । स्व॒स्तये॑ ॥७.१॥
स्वर रहित मन्त्र
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम्। दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये ॥
स्वर रहित पद पाठसुऽत्रामाणम् । पृथिवीम् । द्याम् । अनेहसम् । सुऽशर्माणम् । अदितिम् । सुऽप्रणीतिम् । दैवीम् । नावम् । सुऽअरित्राम् । अनागस: । अस्रवन्तीम् । आ । रुहेम । स्वस्तये ॥७.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 6; मन्त्र » 3
भाषार्थ -
(सुत्रामाणम्) उत्तम त्राण करने वाली (पृथिवीम्) विस्तीर्ण (द्याम्) द्योतमान (अनेहसम्) पापरहित, (सुशर्माणम्, अदितिम्, सु प्रणीतिम्) अर्थ मन्त्र ७।६।२; (स्वरित्राम्) उत्तम चप्षुओं वाली, (दैवी) देवसम्बन्धी (अस्रवन्तीम्) स्रवण न करने वाली (नावम्) नौका पर (अनागसः) पापरहित हम (स्वस्तये) कल्याण के लिये (आरुहेम) आरोहण करें।
टिप्पणी -
[मन्त्र में जलीय नौका, तथा अदितिरूप परमेश्वरी-मातृरूप नौका का मिश्रित वर्णन हुआ है। "अनेहसम्" का अर्थ है पापरहित, इसका साक्षात् सम्बन्ध परमेश्वर माता के साथ है, वह पापरहिता है, जलीय नौका के साथ इस का सम्बन्ध नहीं प्रतीत होता। इसी प्रकार "अनागसः" का सम्बन्ध भी पारमेश्वरी-नौका के साथ है। उपासक पापरहित होकर ही पारमेश्वरी-नौका पर आरोहण कर सकते हैं, जलीय नौका पर तो पापी, निष्पापी सभी आरोहण कर सकते हैं। परमेश्वर नौकारूप है। श्वेता० उप० (अ० २। खण्ड ८) में परमेश्वर को "ब्रह्मोडुप" कहा है, यथा– "ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि", अर्थात् अध्यास्मविद्-उपासक ब्रह्मरूपी-उडुप द्वारा सब भयावह स्रोतों को तैर जाय। भयावह स्रोत हैं, इन्द्रिय स्रोत। उडुप का अर्थ है नौका। परमेश्वर-माता भी त्रायमाणा है, रक्षिका है, पृथिवी के सदृश विस्तीर्णा है, द्यौः की तरह द्योतमाना है, और सुप्रणीति अर्थात् विशेषतया प्रणय वाली है। वह "स्वरित्रा" माता है, कामक्रोध आदि अरियों से सुगमता से त्राण करती है। वह नौका है इसलिये इस पर आरोहण भी सम्भव है। जलीय नौका भी विस्तीर्ण [पृथिवीम्] होनी चाहिये, तथा उसमें प्रकाश का प्रबन्ध होना चाहिये [द्याम्], तथा उस में उत्तम गृह भी होने चाहिये [शर्म गृहनाम निघं० ३।४] ताकि यात्री उनमें विश्राम कर सकें तथा वह छिद्ररहित होनी चाहिये [अस्रवन्तीम्] ताकि नदी या समुद्र का जल उसमें श्रवण न कर सके]।