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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1009
ऋषिः - जमदग्निर्भार्गवः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
6

शु꣣भ्र꣡मन्धो꣢꣯ दे꣣व꣡वा꣢तम꣣प्सु꣢ धौ꣣तं꣡ नृभिः꣢꣯ सु꣣त꣢म् । स्व꣡द꣢न्ति꣣ गा꣢वः꣣ प꣡यो꣢भिः ॥१००९॥

स्वर सहित पद पाठ

शु꣣भ्र꣢म् । अ꣡न्धः꣢꣯ । दे꣣व꣡वा꣢तम् । दे꣣व꣢ । वा꣣तम् । अप्सु꣢ । धौ꣣त꣢म् । नृ꣡भिः꣢꣯ । सु꣣त꣢म् । स्व꣡द꣢꣯न्ति । गा꣡वः꣢꣯ । प꣡यो꣢꣯भिः ॥१००९॥


स्वर रहित मन्त्र

शुभ्रमन्धो देववातमप्सु धौतं नृभिः सुतम् । स्वदन्ति गावः पयोभिः ॥१००९॥


स्वर रहित पद पाठ

शुभ्रम् । अन्धः । देववातम् । देव । वातम् । अप्सु । धौतम् । नृभिः । सुतम् । स्वदन्ति । गावः । पयोभिः ॥१००९॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1009
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 16; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 6; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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पदार्थ -
प्रथम—सोम ओषधि के रस के विषय में। (देववातम्) सूर्य या मेघ द्वारा बढ़ाये हुए (अप्सु) जलों से (धौतम्) धोये हुए, (नृभिः) ऋत्विज् मनुष्यों से (सुतम्) अभिषुत किये गये (शुभ्रम् अन्धः) स्वच्छ सोमरस को (गावः) गौएँ (पयोभिः) अपने दूधों से (स्वदन्ति) स्वादु बनाती हैं ॥ द्वितीय—ज्ञानरस के विषय में। (देववातम्) विद्वान् आचार्य से प्रेरित, (अप्सु) कर्मों में, आचरणों में (धौतम्) पहुँचाये हुए, (नृभिः) अन्य मार्गदर्शक गुरुजनों से (सुतम्) उत्पन्न किये गये (शुभ्रम् अन्धः) स्वच्छ ज्ञानरस को (गावः) वेदवाणियाँ (पयोभिः) ओङ्काररूप दूध से (स्वदन्ति) मधुर कर देती हैं ॥२॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥२॥

भावार्थ - भौतिक ज्ञान अध्यात्म ज्ञान से मिलकर महान् कल्याण करनेवाला हो जाता है ॥२॥

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