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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1040
ऋषिः - मेधातिथिः काण्वः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
5
म꣣हा꣡न्तं꣢ त्वा म꣣ही꣡रन्वापो꣢꣯ अर्षन्ति꣣ सि꣡न्ध꣢वः । य꣡द्गोभि꣢꣯र्वासयि꣣ष्य꣡से꣢ ॥१०४०॥
स्वर सहित पद पाठम꣣हा꣡न्त꣢म् । त्वा꣣ । महीः꣢ । अ꣡नु꣢꣯ । आ꣡पः꣢꣯ । अ꣣र्षन्ति । सि꣡न्ध꣢꣯वः । यत् । गो꣡भिः꣢꣯ । वा꣣सयिष्य꣡से꣢ ॥१०४०॥
स्वर रहित मन्त्र
महान्तं त्वा महीरन्वापो अर्षन्ति सिन्धवः । यद्गोभिर्वासयिष्यसे ॥१०४०॥
स्वर रहित पद पाठ
महान्तम् । त्वा । महीः । अनु । आपः । अर्षन्ति । सिन्धवः । यत् । गोभिः । वासयिष्यसे ॥१०४०॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1040
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 4
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 4
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 4
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 4
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विषय - अब परमात्मा की महिमा वर्णित करते हैं।
पदार्थ -
हे सोम अर्थात् जगत्स्रष्टा परमात्मन् ! (महान्तम्) अतिशय महान् (त्वा अनु) आपके आदेशानुसार (महीः) विशाल, (सिन्धवः) प्रवाहमयी (आपः) नदियाँ (अर्षन्ति) गति करती हैं, (यत्) क्योंकि, आप (गोभिः) सूर्यकिरणों से (वासयिष्यसे) वर्षा द्वारा उन्हें बसाये रखोगे ॥४॥
भावार्थ - नदी आदि सब पदार्थ परमात्मा के निर्धारित नियमों के अनुसार ही चलते हैं, क्योंकि वह जगत् का सम्राट् है ॥४॥
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