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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1190
ऋषिः - असितः काश्यपो देवलो वा
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
5
उ꣣त꣢ नो꣣ वा꣡ज꣢सातये꣣ प꣡व꣢स्व बृह꣣ती꣡रिषः꣢꣯ । द्यु꣣म꣡दि꣢न्दो सु꣣वी꣡र्य꣢म् ॥११९०॥
स्वर सहित पद पाठउत꣢ । नः꣣ । वा꣡ज꣢꣯सातये । वा꣡ज꣢꣯ । सा꣣तये । प꣡व꣢꣯स्व । बृ꣣हतीः꣢ । इ꣡षः꣢꣯ । द्यु꣣म꣢त् । इ꣣न्दो । सुवी꣡र्य꣢म् । सु꣣ । वी꣡र्य꣢꣯म् ॥११९०॥
स्वर रहित मन्त्र
उत नो वाजसातये पवस्व बृहतीरिषः । द्युमदिन्दो सुवीर्यम् ॥११९०॥
स्वर रहित पद पाठ
उत । नः । वाजसातये । वाज । सातये । पवस्व । बृहतीः । इषः । द्युमत् । इन्दो । सुवीर्यम् । सु । वीर्यम् ॥११९०॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1190
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 4
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 4
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 4
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 4
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विषय - अगले मन्त्र में परमेश्वर से प्रार्थना की गयी है।
पदार्थ -
(उत) अब, हे (इन्दो) रस से भिगोनेवाले परमेश्वर ! आप (वाजसातये) आत्मबल तथा मनोबल के प्रदानार्थ (नः) हमारे लिए (बृहतीः) महान् (इषः) अभीष्ट आनन्दरस की धाराओं को, तथा (द्युमत्) तेज से युक्त और (सुवीर्यम्) श्रेष्ठ वीर्य से युक्त ऐश्वर्य को (पवस्व) प्रवाहित करो ॥४॥
भावार्थ - जगदीश्वर ही आत्मबल, आनन्द, तेज और शक्ति का दिव्य स्रोत है ॥४॥
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