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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1191
ऋषिः - असितः काश्यपो देवलो वा देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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अ꣡त्या꣢ हिया꣣ना꣢꣫ न हे꣣तृ꣢भि꣣र꣡सृ꣢ग्रं꣣ वा꣡ज꣢सातये । वि꣢꣫ वार꣣म꣡व्य꣢मा꣣श꣡वः꣢ ॥११९१॥

स्वर सहित पद पाठ

अ꣡त्याः꣢꣯ । हि꣣यानाः꣢ । न । हे꣣तृ꣡भिः꣢ । अ꣡सृ꣢꣯ग्रम् । वा꣡ज꣢꣯सातये । वा꣡ज꣢꣯ । सा꣣तये । वि꣢ । वा꣡र꣢꣯म् । अ꣡व्य꣢꣯म् । आ꣣श꣡वः꣢ ॥११९१॥


स्वर रहित मन्त्र

अत्या हियाना न हेतृभिरसृग्रं वाजसातये । वि वारमव्यमाशवः ॥११९१॥


स्वर रहित पद पाठ

अत्याः । हियानाः । न । हेतृभिः । असृग्रम् । वाजसातये । वाज । सातये । वि । वारम् । अव्यम् । आशवः ॥११९१॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1191
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 5
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 5
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पदार्थ -
(वाजसातये) संग्राम के लिए (हेतृभिः) प्रेरक योद्धाओं से (हियानाः) प्रेरित किये जाते हुए (अत्याः न) घोड़ों के समान (हेतृभिः) प्रेरक योगाभ्यासों से (हियानाः) प्रेरित किये जाते हुए (आशवः) वेगगामी सोम अर्थात् परमानन्दरस (वाजसातये) बल देने के लिए (वारम्) दोषनिवारक, (अव्यम्) अविनश्वर जीवात्मा के प्रति (वि असृग्रम्) छोड़े जा रहे हैं ॥५॥ यहाँ श्लिष्टोपमा अलङ्कार है ॥५॥

भावार्थ - शीघ्रगामी बलवान् घोड़े जैसे युद्ध में विजय के साधन बनते हैं, वैसे ही योगाभ्यास से उत्पन्न किये गए परम आनन्द बल-प्रदान में कारण बनते हैं ॥५॥

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