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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1238
ऋषिः - अम्बरीषो वार्षागिर ऋजिश्वा भारद्वाजश्च
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम -
4
अ꣣भी꣡ नो꣢ वाज꣣सा꣡त꣢मं रयिमर्ष शतस्पृहम् । इन्दो सहस्रभर्णसं तुविद्युम्नं विभासहम् ॥१२३८॥
स्वर सहित पद पाठअ꣣भि꣢ । नः꣣ । वाजसा꣡त꣢मम् । वा꣣ज । सा꣡त꣢꣯मम् । र꣣यि꣢म् । अ꣣र्ष । शतस्पृ꣡ह꣢म् । श꣣त । स्पृ꣡ह꣢꣯म् । इ꣡न्दो꣢꣯ । स꣣ह꣡स्र꣢भर्णसम् । स꣣ह꣡स्र꣢ । भ꣣र्णसम् । तुविद्युम्न꣢म् । तु꣣वि । द्युम्न꣢म् । वि꣣भास꣡ह꣢म् । वि꣣भा । स꣡ह꣢꣯म् ॥१२३८॥
स्वर रहित मन्त्र
अभी नो वाजसातमं रयिमर्ष शतस्पृहम् । इन्दो सहस्रभर्णसं तुविद्युम्नं विभासहम् ॥१२३८॥
स्वर रहित पद पाठ
अभि । नः । वाजसातमम् । वाज । सातमम् । रयिम् । अर्ष । शतस्पृहम् । शत । स्पृहम् । इन्दो । सहस्रभर्णसम् । सहस्र । भर्णसम् । तुविद्युम्नम् । तुवि । द्युम्नम् । विभासहम् । विभा । सहम् ॥१२३८॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1238
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 16; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 8; सूक्त » 2; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 16; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 8; सूक्त » 2; मन्त्र » 1
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विषय - प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ५४९ क्रमाङ्क पर परमात्मा को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ पर परमात्मा, राजा और आचार्य से प्रार्थना है।
पदार्थ -
हे (इन्दो) आनन्दरस तथा विद्यारस से भिगोनेवाले तेजस्वी परमात्मन्, राजन् वा आचार्य ! आप (वाजसातमम्) अतिशय बल के प्रदाता, (शतस्पृहम्) सैकड़ों मनुष्यों से चाहने योग्य, (सहस्रभर्णसम्) सहस्रों गुणों को धारण करानेवाले अथवा सहस्रों जनों के पोषक, (तुविद्युम्नम्) बहुत यश देनेवाले, (विभासहम्) शत्रुओं के तेज को अभिभूत करनेवाले (रयिम्) आध्यात्मिक धन को, सुवर्ण आदि धन को वा विद्याधन को (नः) हम उपासकों, प्रजाजनों वा छात्रों को (अभि अर्ष) प्राप्त कराओ ॥१॥
भावार्थ - परमेश्वर से ब्रह्मानन्द का धन, राजा से सुवर्ण आदि धन और आचार्य से विद्याधन प्राप्त करके ही उपासक, प्रजाजन और विद्यार्थी कृतकृत्य होते हैं ॥१॥
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