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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1360
ऋषिः - प्रगाथो घौरः काण्वः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)
स्वरः - मध्यमः
काण्ड नाम -
5
मा꣡ चि꣢द꣣न्य꣡द्वि श꣢꣯ꣳसत꣣ स꣡खा꣢यो꣣ मा꣡ रि꣢षण्यत । इ꣢न्द्र꣣मि꣡त्स्तो꣢ता꣣ वृ꣡ष꣢ण꣣ꣳ स꣡चा꣢ सु꣣ते꣡ मुहु꣢꣯रु꣣क्था꣡ च꣢ शꣳसत ॥१३६०॥
स्वर सहित पद पाठमा꣢ । चि꣣त् । अन्य꣢त् । अ꣣न् । य꣢त् । वि । श꣣ꣳसत । स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣣यः । मा꣢ । रि꣣षण्यत । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । इत् । स्तो꣣त । वृ꣡ष꣢꣯णम् । स꣡चा꣢꣯ । सु꣣ते꣢ । मु꣡हुः꣢꣯ । उ꣣क्था꣢ । च꣣ । शꣳसत ॥१३६०॥
स्वर रहित मन्त्र
मा चिदन्यद्वि शꣳसत सखायो मा रिषण्यत । इन्द्रमित्स्तोता वृषणꣳ सचा सुते मुहुरुक्था च शꣳसत ॥१३६०॥
स्वर रहित पद पाठ
मा । चित् । अन्यत् । अन् । यत् । वि । शꣳसत । सखायः । स । खायः । मा । रिषण्यत । इन्द्रम् । इत् । स्तोत । वृषणम् । सचा । सुते । मुहुः । उक्था । च । शꣳसत ॥१३६०॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1360
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 11; खण्ड » 2; सूक्त » 2; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 11; खण्ड » 2; सूक्त » 2; मन्त्र » 1
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विषय - प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में २४२ क्रमाङ्क पर परमेश्वर की उपासना के विषय में की जा चुकी है। यहाँ भी वही विषय वर्णित है।
पदार्थ -
हे (सखायः) साथियो ! तुम (अन्यत्) परमेश्वर के अतिरिक्त सूर्य, चाँद, वृक्ष, स्थाणु, प्रतिमा आदि को (मा चित्) कभी मत (विशंसत) पूजो, (मा रिषण्यत) अपूज्यों की पूजा से हानिग्रस्त मत होओ। (सुते) श्रद्धारस के अभिषुत होने पर (सचा) साथ मिलकर (वृषणम्) आनन्द की वर्षा करनेवाले (इन्द्रम् इत्) परमैश्वर्यशाली परमेश्वर की ही (स्तोत) स्तुति करो और (मुहुः मुहुः) बार-बार (उक्था च) स्तोत्रों का (शंसत) कीर्तन करो ॥१॥
भावार्थ - एक सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी, न्यायकारी परमेश्वर की ही पूजा सबको करनी चाहिए। वेदों में इन्द्र, मित्र, वरुण, आदि बहुत से नामों से एक ही परमेश्वर का प्रतिपादन हुआ है ॥१॥
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