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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1431
ऋषिः - नृमेधपुरुमेधावाङ्गिरसौ
देवता - इन्द्रः
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम -
6
आ꣣मा꣡सु꣢ प꣣क्व꣡मैर꣢꣯य꣣ आ꣡ सूर्य꣢꣯ꣳ रोहयो दि꣣वि꣢ । घ꣣र्मं꣡ न सामं꣢꣯ तपता सुवृ꣣क्ति꣢भि꣣र्जु꣢ष्टं꣣ गि꣡र्व꣢णसे बृ꣣ह꣢त् ॥१४३१॥
स्वर सहित पद पाठआ꣣मा꣡सु꣢ । प꣣क्व꣢म् । ऐ꣡र꣢꣯यः । आ । सू꣡र्य꣢꣯म् । रो꣣हयः । दिवि꣢ । घ꣣र्म꣢म् । न । सा꣡म꣢꣯न् । त꣣पता । सुवृक्ति꣡भिः꣢ । सु꣣ । वृक्ति꣡भिः꣢ । जु꣡ष्ट꣢꣯म् । गि꣡र्व꣢꣯णसे । गिः । व꣣नसे । बृहत् ॥१४३१॥
स्वर रहित मन्त्र
आमासु पक्वमैरय आ सूर्यꣳ रोहयो दिवि । घर्मं न सामं तपता सुवृक्तिभिर्जुष्टं गिर्वणसे बृहत् ॥१४३१॥
स्वर रहित पद पाठ
आमासु । पक्वम् । ऐरयः । आ । सूर्यम् । रोहयः । दिवि । घर्मम् । न । सामन् । तपता । सुवृक्तिभिः । सु । वृक्तिभिः । जुष्टम् । गिर्वणसे । गिः । वनसे । बृहत् ॥१४३१॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1431
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 19; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 12; खण्ड » 6; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 19; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 12; खण्ड » 6; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
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विषय - अगले मन्त्र में उपास्य-उपासक का विषय है।
पदार्थ -
हे इन्द्र जगदीश्वर ! आपने (आमासु) अपरिपक्व ओषधियों में (पक्वम्) पका फल, अथवा (आमासु) अपरिपक्व गायों में (पक्वम्) पका दूध (ऐरयः) प्रेरित किया है, (दिवि) आकाश में (सूर्यम्) सूर्य को (आरोहयः) चढ़ाया है। हे मनुष्यो ! तुम (गिर्वणसे) वाणियों से संभजनीय इन्द्र जगदीश्वर के लिए (जुष्टम्) प्रिय (बृहत्) महान् (सामन्) स्तोत्र को (घर्मम् न) अग्नि के समान (तपत) परिपक्व और प्रकाशित करो ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थ - तपस्या से पका हुआ ही स्तोत्र परमात्मा के चित्त को आकृष्ट करता है और फलदायक होता है ॥३॥
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