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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 907
ऋषिः - सुतंभर आत्रेयः
देवता - अग्निः
छन्दः - जगती
स्वरः - निषादः
काण्ड नाम -
11
ज꣡न꣢स्य गो꣣पा꣡ अ꣢जनिष्ट꣣ जा꣡गृ꣢विर꣣ग्निः꣢ सु꣣द꣡क्षः꣢ सुवि꣣ता꣢य꣣ न꣡व्य꣢से । घृ꣣त꣡प्र꣢तीको बृह꣣ता꣡ दि꣢वि꣣स्पृ꣡शा꣢ द्यु꣣म꣡द्वि भा꣢꣯ति भर꣣ते꣢भ्यः꣣ शु꣡चिः꣢ ॥९०७॥
स्वर सहित पद पाठज꣡न꣢꣯स्य । गो꣣पाः꣢ । गो꣣ । पाः꣢ । अ꣣जनिष्ट । जा꣡गृ꣢꣯विः । अ꣣ग्निः꣢ । सु꣣द꣡क्षः꣢ । सु꣣ । द꣡क्षः꣢꣯ । सु꣣वि꣡ता꣢य । न꣡व्य꣢꣯से । घृ꣣त꣡प्र꣢तीकः । घृ꣣त꣢ । प्र꣣तीकः । बृहता꣢ । दि꣣विस्पृ꣡शा꣢ । दि꣣वि । स्पृ꣡शा꣢꣯ । द्यु꣣म꣢त् । वि । भा꣣ति । भरते꣡भ्यः꣢ । शु꣡चिः꣢꣯ ॥९०७॥
स्वर रहित मन्त्र
जनस्य गोपा अजनिष्ट जागृविरग्निः सुदक्षः सुविताय नव्यसे । घृतप्रतीको बृहता दिविस्पृशा द्युमद्वि भाति भरतेभ्यः शुचिः ॥९०७॥
स्वर रहित पद पाठ
जनस्य । गोपाः । गो । पाः । अजनिष्ट । जागृविः । अग्निः । सुदक्षः । सु । दक्षः । सुविताय । नव्यसे । घृतप्रतीकः । घृत । प्रतीकः । बृहता । दिविस्पृशा । दिवि । स्पृशा । द्युमत् । वि । भाति । भरतेभ्यः । शुचिः ॥९०७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 907
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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विषय - प्रथम ऋचा में परमेश्वर का स्वरूप वर्णित है।
पदार्थ -
(जागृविः) जागरूक परमेश्वर (जनस्य) सब मनुष्यों का (गोपाः) रक्षक (अजनिष्ट) बना हुआ है।(सुदक्षः) उत्तम बलवाला वह (अग्निः) अग्रनायक परमेश्वर (नव्यसे) अतिशय नवीन (सुविताय) भद्र-प्राप्ति के लिए सहायक होता है। (घृतप्रतीकः)तेजःस्वरूप, (शुचिः) पवित्र वह (भरतेभ्यः) धारणा, ध्यान, समाधि में स्थित जनों के लिए (दिविस्पृशा) आत्मा को छूनेवाले (बृहता) महान् तेज से (द्युमत्) दीप्यमान होता हुआ (वि भाति) शोभित होता है ॥१॥
भावार्थ - तेजःस्वरूप परमेश्वर उपासकों का रक्षक होता हुआ उन्हें दिव्य तेज प्रदान करके कृतार्थ करता है ॥१॥
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