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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 928
ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - विराडनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम -
13
य꣢स्ते꣣ म꣢दो꣣ यु꣢ज्य꣣श्चा꣢रु꣣र꣢स्ति꣣ ये꣡न꣢ वृ꣣त्रा꣡णि꣢ हर्यश्व꣣ ह꣡ꣳसि꣢ । स꣡ त्वामि꣢꣯न्द्र प्रभूवसो ममत्तु ॥९२८॥
स्वर सहित पद पाठयः । ते꣣ । म꣡दः꣢꣯ । यु꣡ज्यः꣢꣯ । चा꣡रुः꣢꣯ । अ꣡स्ति꣢꣯ । ये꣡न꣢꣯ । वृ꣣त्रा꣡णि꣢ । ह꣣र्यश्व । हरि । अश्व । ह꣡ꣳसि꣢꣯ । सः । त्वाम् । इ꣣न्द्र । प्रभूवसो । प्रभु । वसो । ममत्तु ॥९२८॥
स्वर रहित मन्त्र
यस्ते मदो युज्यश्चारुरस्ति येन वृत्राणि हर्यश्व हꣳसि । स त्वामिन्द्र प्रभूवसो ममत्तु ॥९२८॥
स्वर रहित पद पाठ
यः । ते । मदः । युज्यः । चारुः । अस्ति । येन । वृत्राणि । हर्यश्व । हरि । अश्व । हꣳसि । सः । त्वाम् । इन्द्र । प्रभूवसो । प्रभु । वसो । ममत्तु ॥९२८॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 928
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 13; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 5; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 13; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 5; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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विषय - अगले मन्त्र में परमात्मा जीवात्मा को कह रहा है।
पदार्थ -
(हर्यश्व) ज्ञान कर्म के आहर्ता हैं ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय रूप घोड़े जिसके ऐसे हे जीवात्मन् ! (यः) जो (तव) तेरा (मदः) उत्साह (युज्यः) तेरा सहयोगी और (चारुः) श्रेष्ठ (अस्ति) है, (येन) जिस उत्साह से तू (वृत्राणि) बाह्य और आन्तरिक रिपुओं को (हंसि) विनष्ट करता है, (सः) वह उत्साह, हे (प्रभूवसो) बहुत गुणोंवाले (इन्द्र) जीवात्मन् ! (त्वा) तुझे (ममत्तु) आनन्दित करे ॥२॥
भावार्थ - मनुष्य का आत्मा अपनी शक्ति को पहचानकर जब जीवन-संग्राम में उतरता है तब उसकी विजय सुनिश्चित है ॥२॥
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