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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1059
ऋषिः - अवत्सारः काश्यपः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
4
ध्व꣣स्र꣡योः꣢ पुरु꣣ष꣢न्त्यो꣣रा꣢ स꣣ह꣡स्रा꣢णि दद्महे । त꣢र꣣त्स꣢ म꣣न्दी꣡ धा꣢वति ॥१०५९॥
स्वर सहित पद पाठध्व꣣स्र꣡योः꣢ । पु꣣रुष꣡न्त्योः꣢ । पु꣣रु । स꣡न्त्योः꣢꣯ । आ । स꣣ह꣡स्रा꣢णि । द꣣द्महे । त꣡र꣢꣯त् । सः । म꣣न्दी꣢ । धा꣣वति ॥१०५९॥
स्वर रहित मन्त्र
ध्वस्रयोः पुरुषन्त्योरा सहस्राणि दद्महे । तरत्स मन्दी धावति ॥१०५९॥
स्वर रहित पद पाठ
ध्वस्रयोः । पुरुषन्त्योः । पुरु । सन्त्योः । आ । सहस्राणि । दद्महे । तरत् । सः । मन्दी । धावति ॥१०५९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1059
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 5; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 2; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 5; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 2; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
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विषय - प्राण और व्यान
पदार्थ -
शरीर के सब मलों व रोगकृमियों को प्राणापानशक्ति ही ध्वस्त करती है, अतः इन्हें यहाँ 'ध्वस्त्र' नाम दिया गया है – ध्वंस करनेवाले । मलों को धवस्त करके ये प्राणापान हमारे शरीर के अङ्ग-प्रत्यङ्ग के पालन व पोषण के लिए [पुरु] विविध षन्ति = gift = शक्तियों की भेंटों को प्राप्त कराते हैं, अतः ये 'पुरु षन्ति' नामवाले हो गये हैं । इन (ध्वस्त्रयोः) = मलों का ध्वंस करनेवाले (पुरुषन्त्योः) = पालन व पूरण करनेवाली शक्तियों की भेंट देनेवाले प्राणापानों के (सहस्राणि) = [सहस्+र] शक्ति-दानों को (आदमहे) = हम स्वीकार करते हैं । सहस्र शब्द 'सहस्-बल को राति=देता है' इस व्युत्पत्ति से ‘शक्तिदान' का वाचक है । सारी शक्ति का दान प्राणापान ही पर निर्भर करता है । इन प्राणापानों से शक्ति प्राप्त करनेवाला (सः) = वह 'अवत्सार' (तरत्) = विघ्नों व रोगों को तरता हुआ (मन्दी) = उल्लासमय जीवनवाला (धावति) = आगे और आगे बढ़ता है और अधिकाधिक शुद्ध होता जाता है।
भावार्थ -
प्राणापान 'ध्वस्र' हैं, 'पुरु षन्ति' हैं, इस तत्त्व को समझकर हम इनसे शक्तिदान प्राप्त करनेवाले हों ।
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