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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1106
ऋषिः - कुत्स आङ्गिरसः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
काण्ड नाम -
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म꣢ही꣣मे꣡ अ꣢स्य꣣ वृ꣢ष꣣ ना꣡म꣢ शू꣣षे꣡ माꣳश्च꣢꣯त्वे वा꣣ पृ꣡श꣢ने वा꣣ व꣡ध꣢त्रे । अ꣡स्वा꣢पयन्नि꣣गु꣡तः꣢ स्ने꣣ह꣢य꣣च्चा꣢पा꣣मि꣢त्रा꣣ꣳ अ꣢पा꣣चि꣡तो꣢ अचे꣣तः꣢ ॥११०६॥
स्वर सहित पद पाठम꣡ही꣢꣯ । इ꣣मे꣡इति꣢ । अ꣣स्य । वृ꣡ष꣢꣯ । ना꣡म꣢꣯ । शू꣣षे꣡इति꣢ । मा꣡ꣳश्च꣢꣯त्वे । वा꣣ । पृ꣡श꣢꣯ने । वा꣣ । व꣡ध꣢꣯त्रे꣣इ꣡ति꣢ । अ꣡स्वा꣢꣯पयत् । नि꣣गु꣡तः꣢ । नि꣣ । गु꣡तः꣢꣯ । स्ने꣣ह꣡य꣢त् । च꣣ । अ꣡प꣢꣯ । अ꣣मि꣡त्रा꣢न् । अ꣣ । मि꣡त्रा꣢꣯न् । अ꣡प꣢꣯ । अ꣣चि꣡तः꣢ । अ꣣ । चि꣡तः꣢꣯ । अ꣣च । इतः꣢ ॥११०६॥
स्वर रहित मन्त्र
महीमे अस्य वृष नाम शूषे माꣳश्चत्वे वा पृशने वा वधत्रे । अस्वापयन्निगुतः स्नेहयच्चापामित्राꣳ अपाचितो अचेतः ॥११०६॥
स्वर रहित पद पाठ
मही । इमेइति । अस्य । वृष । नाम । शूषेइति । माꣳश्चत्वे । वा । पृशने । वा । वधत्रेइति । अस्वापयत् । निगुतः । नि । गुतः । स्नेहयत् । च । अप । अमित्रान् । अ । मित्रान् । अप । अचितः । अ । चितः । अच । इतः ॥११०६॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1106
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 21; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 6; सूक्त » 5; मन्त्र » 3
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 21; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 6; सूक्त » 5; मन्त्र » 3
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विषय - वृष-नाम [ वर्षण- नमन ]
पदार्थ -
[वर्षणं = वृष:, नमनं = नाम] (अस्य) = इस प्रभु के (इमे) = ये (वृष नाम) = वर्षण और नमन-[झुका देना]-रूप दो कार्य (महि) = महनीय हैं— बड़े महत्त्वपूर्ण हैं । इसका वर्षण तो (शूषे) = बल के विषय में [नि० २.९] और मांश्चत्वे- [अश्वनाम नि० अश्व-उत्तम कर्मशक्ति, मन् धातु से बनाएँ तो इसका अर्थ 'ज्ञान' होगा] कर्म तथा ज्ञान के विषय में है और नमन पृशने-आसक्ति के विषय में [पृशन्-attachment] (वा) = तथा (वधत्रे) - विषयासक्ति के [sexual passion] या अनुचित प्रेम के विषय में है, अर्थात् जब हम प्रभु से अपना सम्पर्क बनाते हैं तब हमपर बल, सुख तथा कर्मशक्ति व ज्ञान की वर्षा होती है और हमारी आसक्ति व वासना का विनाश हो जाता है ।
वे प्रभु (निगुतः) = [ नितरां शब्दायन्ते प्रभुम् ] नितरां अपना आह्वान करनेवाले भक्तों को (अस्वापयत्) = [यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः] उन विषयों में सुला देते हैं, जिनमें सामान्य लोग बड़े जागरित हो रहे हैं, अर्थात् प्रभुकृपा से एक भक्त का सांसारिक विषय-वासनाओं की ओर सुझाव ही नहीं रहता ।
ये प्रभु (अमित्रान्) = काम-क्रोधादि शत्रुओं को (अपस्नेहयत्) = दूर नष्ट करते हैं। [स्नेहयति to kill]। (अचितः) = सत्कर्मों का चयन न करनेवाले दुष्ट लोगों को ये प्रभु अप हमसे दूर करते हैं और वे प्रभु (अचेत:) = चेतनाशून्य [absent mindedness] अवस्था को हमसे (अप) = दूर करते हैं ।
भावार्थ -
प्रभुकृपा से हमपर बल, सुख, कर्मशक्ति व ज्ञान की वर्षा हो । हमारी आसक्ति व वासना विनष्ट हो। हम प्रभुभक्त बन सांसारिक विषयों में सोये रहें । हमारे काम-क्रोधादि नष्ट हों, दुष्ट लोगों का सङ्ग दूर हो, चेतनाशून्यावस्था से हम बचें।
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