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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1111
ऋषिः - भुवन आप्त्यः साधनो वा भौवनः
देवता - विश्वे देवाः
छन्दः - द्विपदा त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
काण्ड नाम -
3
य꣣ज्ञं꣡ च꣢ नस्त꣣꣬न्वं꣢꣯ च प्र꣣जां꣡ चा꣢दि꣣त्यै꣡रिन्द्रः꣢꣯ स꣣ह꣡ सी꣢षधातु ॥११११॥
स्वर सहित पद पाठय꣣ज्ञ꣢म् । च꣣ । नः । तन्व꣢म् । च꣣ । प्रजा꣢म् । प्र꣣ । जा꣢म् । च꣣ । आदित्यैः꣢ । आ꣣ । दित्यैः꣢ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । स꣣ह꣢ । सी꣣षधातु ॥११११॥
स्वर रहित मन्त्र
यज्ञं च नस्तन्वं च प्रजां चादित्यैरिन्द्रः सह सीषधातु ॥११११॥
स्वर रहित पद पाठ
यज्ञम् । च । नः । तन्वम् । च । प्रजाम् । प्र । जाम् । च । आदित्यैः । आ । दित्यैः । इन्द्रः । सह । सीषधातु ॥११११॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1111
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 23; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 7; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 23; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 7; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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विषय - सन्तान प्रभु की धरोहर है
पदार्थ -
प्रभु चाहते हैं कि–(इन्द्रः) = इन्द्रियों का अधिष्ठाता जीव (आदित्यैः सह) = सदा गुणों का आदान करनेवाले सज्जनों के सङ्ग में वास करता हुआ (यज्ञं च) = उत्तम कर्मों को (नः तन्वं च) = हमारे दिये हुए इस शरीर को प्रजां च और इस हमारी प्रजा को, सन्तान को (सीषधातु) = जीवन- यात्रा में उन्नति के लिए साधन बनाए ।
प्रस्तुत मन्त्र में निम्न बातें ध्यान देने योग्य हैं
१. मनुष्य को इन्द्रियों का अधिष्ठाता बनने का प्रयत्न करना । उसका नाम ही प्रभु ने ‘इन्द्र'=इन्द्रियों का अधिष्ठाता रक्खा है । २. सदा गुणीजनों के सम्पर्क में चलना, क्योंकि जैसों के साथ रहता है, वैसा ही मनुष्य बन जाता है । ३. जीवन यात्रा में सदा यज्ञिय मनोवृत्ति से चलना । प्रभु ने प्रजाओं को उत्पन्न ही यज्ञों के साथ किया है। 'सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा० ' । ४. शरीर को अपना न समझ प्रभु का समझना, इसीलिए इसे पूर्ण स्वस्थ रखने का प्रयत्न करना । ५. सन्तान को प्रभु की धरोहर समझ मधुरता व प्रेम से, परन्तु बिना किसी मोह के उत्तम बनाना।
भावार्थ -
हे प्रभो! हम इन्द्र बनें, आदित्यों के सहवास में रहें, यज्ञशील हों, आप के दिये शरीर को विकृत न होने दें, सन्तान को आपकी धरोहर समझें।
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