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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1161
ऋषिः - अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - द्विपदा विराट्
स्वरः - पञ्चमः
काण्ड नाम -
4
स꣢ वा꣣꣬ज्य꣢꣯क्षाः स꣣ह꣡स्र꣢रेता अ꣣द्भि꣡र्मृ꣢जा꣣नो꣡ गोभिः꣢꣯ श्रीणा꣣नः꣢ ॥११६१॥
स्वर सहित पद पाठसः । वा꣣जी꣢ । अ꣣क्षारि꣡ति꣢ । स꣣ह꣡स्र꣢रेताः । स꣣ह꣡स्र꣢ । रे꣣ताः । अद्भिः꣢ । मृ꣣जानः꣢ । गो꣡भिः꣢꣯ । श्री꣣णानः꣢ ॥११६१॥
स्वर रहित मन्त्र
स वाज्यक्षाः सहस्ररेता अद्भिर्मृजानो गोभिः श्रीणानः ॥११६१॥
स्वर रहित पद पाठ
सः । वाजी । अक्षारिति । सहस्ररेताः । सहस्र । रेताः । अद्भिः । मृजानः । गोभिः । श्रीणानः ॥११६१॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1161
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 10; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 8; खण्ड » 5; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 10; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 8; खण्ड » 5; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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विषय - कर्म से शुद्धि-ज्ञान से परिपाक
पदार्थ -
(सः) = वह (वाजी) = बलवाला (सहस्ररेताः) = आनन्दमय शक्तिवाला— अर्थात् वीर्य की ऊर्ध्वगति से आनन्दमय जीवनवाला (अद्भिः) = कर्मों से [आप:-कर्माणि] (मृजान:) = अपने जीवन को शुद्ध करता हुआ और (गोभी:) = ज्ञान-वाणियों से (श्रीणानः) = अपना परिपाक करता हुआ (अक्षाः) = उस प्रभु को प्राप्त करनेवाला होता है [अश् व्याप्तौ]।
प्रस्तुत मन्त्र में प्रभु-प्राप्ति के लिए निम्न बातों का संकेत किया है – १. (वाजी) = मनुष्य बल का सम्पादन करे, २. (सहस्ररेता:) = वीर्य की ऊर्ध्वगति से उल्लासमय जीवनवाला हो, ३. वासनाओं का शिकार न हो, ४. ज्ञानपूर्वक कर्मों में लगा रहकर अपने जीवन को परिपक्व बनाने का प्रयत्न करे । ऐसा जीवन बनाने से हम [अग्नयः] आगे बढ़नेवाले होते हैं, ‘धिष्ण्याः' उच्च स्थान में [Worthy of a high place] पहुँचने के योग्य होते हैं, ‘ऐश्वराः ' हम ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग पर चल रहे होते हैं और ‘ऋषय:' तत्त्वदर्शी बनते हैं । इस प्रकार इन मन्त्रों के ऋषि होते हैं।
भावार्थ -
हम अपने जीवनों को कर्मों द्वारा शुद्ध करें और ज्ञान द्वारा परिपक्व बनाएँ ।
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