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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 120
ऋषिः - देवजामय इन्द्रमातर ऋषिकाः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
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त्व꣡मि꣢न्द्र꣣ ब꣢ला꣣द꣢धि꣣ स꣡ह꣢सो जा꣣त꣡ ओज꣢꣯सः । त्वꣳ सन्वृ꣢꣯ष꣣न्वृ꣡षेद꣢꣯सि ॥१२०॥

स्वर सहित पद पाठ

त्व꣢म् । इ꣣न्द्र । ब꣡ला꣢꣯त् । अ꣡धि꣢꣯ । स꣡ह꣢꣯सः । जा꣣तः꣢ । ओ꣡ज꣢꣯सः । त्व꣢म् । सन् । वृ꣣षन् । वृ꣡षा꣢꣯ । इत् । अ꣣सि ॥१२०॥


स्वर रहित मन्त्र

त्वमिन्द्र बलादधि सहसो जात ओजसः । त्वꣳ सन्वृषन्वृषेदसि ॥१२०॥


स्वर रहित पद पाठ

त्वम् । इन्द्र । बलात् । अधि । सहसः । जातः । ओजसः । त्वम् । सन् । वृषन् । वृषा । इत् । असि ॥१२०॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 120
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 3; मन्त्र » 6
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 1;
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पदार्थ -

इस मन्त्र की ऋषिका 'देवजामयः इन्द्रमातरः' हैं। ये दिव्य गुणों को जन्म देनेवाली हैं और इन्द्र का निर्माण करती हैं। यदि माता शैशव में ही उसे आत्मा की सम्पत्ति कमाने का उपदेश करेगी तो वह जीव सचमुच 'इन्द्र' बनेगा, अन्यथा इन्द्रियों को सबल बनाने में ही लगा रहेगा। माताओं को बालकों में आरम्भ से ही दिव्य गुणों को पैदा करने के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए, अतः ये देव- जामियाँ जात बालक से कहतीं हैं कि (इन्द्र) = इन्द्र! (त्वम्) =तू (बलात् अधिजातः असि)= मानस बल से उत्पन्न हुआ है, तू (सहस:) = सहन-शक्ति से उत्पन्न हुआ है, (ओजसः) = ओजस् से उत्पन्न हुआ है। तुझे मानस अपने में बल व ओज का सम्पादन करना है और सहन शक्ति का पुञ्ज बनना है। मानस बल का सम्पादन करके (त्वम्) = तू (सन्) = एक विशेष सत्तावाला बनना । तू संसार में non-entity=सत्ताशून्य निर्बल-सा प्राणी न बनना। सहन शक्ति का पुञ्ज होकर तू (वृषन्) = सुखों की वर्षा करनेवाला हो। इस प्रकार ओजस्वी बनकर तू इत् सचमुच (वृषा) = बलवान् बनना- प्रभावशाली बनना, औरों पर अपने प्रभाव की वर्षा करनेवाला होना। यह बल, सहस् व ओज ही तेरी आत्मिक सम्पत्ति हैं, तू इन्हीं को महत्त्व देना

भावार्थ -

माताएँ अपने बालकों में दिव्य गुणों को जन्म देकर उन्हें परमैश्वर्यशाली 'इन्द्र' बनाएँ।

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