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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1200
ऋषिः - असितः काश्यपो देवलो वा
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
2
यः꣡ सोमः꣢꣯ क꣣ल꣢शे꣣ष्वा꣢ अ꣣न्तः꣢ प꣣वि꣢त्र꣣ आ꣡हि꣢तः । त꣢꣫मिन्दुः꣣ प꣡रि꣢ षस्वजे ॥१२००॥
स्वर सहित पद पाठयः । सो꣡मः꣢꣯ । क꣣ल꣡शे꣢षु । आ । अ꣣न्त꣡रिति꣢ । प꣣वि꣡त्रे꣢ । आ꣡हि꣢꣯तः । आ । हि꣣तः । त꣢म् । इ꣡न्दुः꣢꣯ । प꣡रि꣢꣯ । स꣣स्वजे ॥१२००॥
स्वर रहित मन्त्र
यः सोमः कलशेष्वा अन्तः पवित्र आहितः । तमिन्दुः परि षस्वजे ॥१२००॥
स्वर रहित पद पाठ
यः । सोमः । कलशेषु । आ । अन्तरिति । पवित्रे । आहितः । आ । हितः । तम् । इन्दुः । परि । सस्वजे ॥१२००॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1200
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 5
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 5
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 5
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 5
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विषय - प्रभु का आलिंगन
पदार्थ -
(यः) = जो भी व्यक्ति १. (सोम:) = सोमपान करके सोम [शक्ति ] का पुञ्ज बनता है, परन्तु साथ ही अत्यन्त सौम्य स्वभाववाला होता है। २. (कलशेषु) = [कला: शेरते एषु] प्राणादि सोलह कलाओं के आधारभूत पञ्चकोषों के (अन्तः) = अन्दर (आपवित्र:) = समन्तात् पवित्र होकर (आहित:)-स्थापित होता है। जो अपने शरीर को निर्बलता, प्राणमयकोश को रोग, मनोमयकोश को द्वेषादि, विज्ञानमयकोश को कुण्ठता तथा आनन्दमयकोश को असहिष्णुता आदि मलों से मलिन नहीं होने देता और इस प्रकार सर्वथा पवित्र होकर इन कलशों- कोशों में निवास करता है, (तम्) = उसको ही (इन्द्रः) = वे सर्वशक्तिमान् सर्वैश्वर्य सम्पन्न प्रभु (परिषस्वजे) = आलिंगन करते हैं ।
भावार्थ -
हम सौम्य व पवित्र बनकर प्रभु के आलिंगन के पात्र बनें ।
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