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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1248
ऋषिः - नृमेध आङ्गिरसः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - उष्णिक्
स्वरः - ऋषभः
काण्ड नाम -
3
अ꣣भि꣡ हि स꣢꣯त्य सोमपा उ꣣भे꣢ ब꣣भू꣢थ꣣ रो꣡द꣢सी । इ꣡न्द्रासि꣢꣯ सुन्व꣣तो꣢ वृ꣣धः꣡ पति꣢꣯र्दि꣣वः꣡ ॥१२४८॥
स्वर सहित पद पाठअ꣣भि꣢ । हि । स꣣त्य । सोमपाः । सोम । पाः । उभे꣡इति꣢ । ब꣣भू꣡थ꣢ । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣡सि꣢꣯ । सु꣣न्वतः꣢ । वृ꣣धः꣢ । प꣡तिः꣢꣯ । दि꣣वः꣢ ॥१२४८॥
स्वर रहित मन्त्र
अभि हि सत्य सोमपा उभे बभूथ रोदसी । इन्द्रासि सुन्वतो वृधः पतिर्दिवः ॥१२४८॥
स्वर रहित पद पाठ
अभि । हि । सत्य । सोमपाः । सोम । पाः । उभेइति । बभूथ । रोदसीइति । इन्द्र । असि । सुन्वतः । वृधः । पतिः । दिवः ॥१२४८॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1248
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 19; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 9; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 19; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 9; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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विषय - दिवः पति
पदार्थ -
‘नृमेध आङ्गिरस’–नरमात्र के साथ अपना सम्पर्क रखनेवाला, सबको ‘मैं' के रूप में ही देखनेवाला – स्वार्थ से ऊपर उठा होने के कारण शक्तिशाली पुरुष इस मन्त्र का ऋषि है । प्रभु इससे कहते हैं कि—हे नृमेध! १. तू (सत्य) = सत्य का पालन करनेवाला बना है, २. (हि) = क्योंकि तू (सोमपा:) = सोम का पान करनेवाला है— अपनी शक्ति की रक्षा करनेवाला है, ३. (उभे रोदसी) = दोनों द्युलोक व पृथिवीलोक को–शरीर व मस्तिष्क को (अभिबभूथ) = अपने वश में रखनेवाला है । ४. तू (इन्द्रः असि) = इन्द्रियों का अधिष्ठाता होने से सचमुच 'इन्द्र' है । ५. (सुन्वतो वृधः) = यज्ञशीलों का तू सदा सहायक व वर्धक है । यह नृमेध प्रत्येक निर्माणात्मक कार्य में हाथ बटानेवाला होता है । ६. और अन्त में (दिवः पतिः) = यह ज्ञान व दिव्यता का स्वामी बनता है ।
भावार्थ -
हमारा जीवन सत्य हो । हम शक्ति की रक्षा करें, शरीर व मस्तिष्क पर हमारा काबू हो । हम जितेन्द्रिय बनें, यज्ञों के सहायक व ज्ञान के स्वामी बनें ।
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