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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1264
ऋषिः - शुनःशेप आजीगर्तिः स देवरातः कृत्रिमो वैश्वामित्रः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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ए꣣ष꣢ प्र꣣त्ने꣢न꣣ ज꣡न्म꣢ना दे꣣वो꣢ दे꣣वे꣡भ्यः꣢ सु꣣तः꣢ । ह꣡रिः꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ अर्षति ॥१२६४॥

स्वर सहित पद पाठ

ए꣣षः꣢ । प्र꣣त्ने꣡न꣢ । ज꣡न्म꣢꣯ना । दे꣣वः꣢ । दे꣣वे꣡भ्यः꣢ । सु꣣तः꣢ । ह꣡रिः꣢꣯ । प꣣वि꣡त्रे꣢ । अ꣣र्षति ॥१२६४॥


स्वर रहित मन्त्र

एष प्रत्नेन जन्मना देवो देवेभ्यः सुतः । हरिः पवित्रे अर्षति ॥१२६४॥


स्वर रहित पद पाठ

एषः । प्रत्नेन । जन्मना । देवः । देवेभ्यः । सुतः । हरिः । पवित्रे । अर्षति ॥१२६४॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1264
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 2; मन्त्र » 9
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 1; सूक्त » 2; मन्त्र » 9
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पदार्थ -

जीवात्मा यदि एक शरीर में अपनी साधना पूर्ण न करके शरीरान्तर को धारण करता है तो (एषः) = यह प्रत्नेन (जन्मना) = जीवन के अत्यन्त शैशवकाल से ही [ from the very early childhood] देव:- दिव्य गुणोंवाला होता हुआ (देवेभ्यः सुतः) = मानो दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए ही उत्पन्न हुआ-हुआ (हरिः) = सभी के दुःखों को हरण करने की वृत्तिवाला (पवित्रे) = पवित्र प्रभु में (अर्षति) = गति करता है ।

पिछले जन्म के संस्कार उसे फिर से इस दिव्य मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं । इसका जन्म ही दिव्य गुणों की प्राप्त के लिए हुआ लगता है । यह सदा उस प्रभु में विचरता है और यथासम्भव औरों के कष्टों को कम करने की प्रवृत्तिवाला होता है ।

भावार्थ -

हम सदा उस पवित्र प्रभु में विचरने का प्रयत्न करें ।

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