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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1301
ऋषिः - पवित्र आङ्गिरसो वा वसिष्ठो वा उभौ वा देवता - पवमानाध्येता छन्दः - अनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः काण्ड नाम -
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पा꣣वमानी꣡र्द꣢धन्तु न इ꣣मं꣢ लो꣣क꣡मथो꣢꣯ अ꣣मु꣢म् । का꣢मा꣣न्त्स꣡म꣢र्धयन्तु नो दे꣣वी꣢र्दे꣣वैः꣢ स꣣मा꣡हृ꣢ताः ॥१३०१

स्वर सहित पद पाठ

पा꣣वमानीः꣢ । द꣣धन्तु । नः । इम꣢म् । लो꣣क꣢म् । अ꣡थ꣢꣯ । उ꣣ । अमु꣢म् । का꣡मा꣢꣯न् । सम् । अ꣣र्धयन्तु । नः । देवीः꣡ । दे꣣वैः꣡ । स꣣मा꣡हृ꣢ताः । स꣣म् । आ꣡हृ꣢꣯ताः ॥१३०१॥


स्वर रहित मन्त्र

पावमानीर्दधन्तु न इमं लोकमथो अमुम् । कामान्त्समर्धयन्तु नो देवीर्देवैः समाहृताः ॥१३०१


स्वर रहित पद पाठ

पावमानीः । दधन्तु । नः । इमम् । लोकम् । अथ । उ । अमुम् । कामान् । सम् । अर्धयन्तु । नः । देवीः । देवैः । समाहृताः । सम् । आहृताः ॥१३०१॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1301
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 8; मन्त्र » 4
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 7; सूक्त » 1; मन्त्र » 4
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पदार्थ -

(पावमानीः) = हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाली ये ऋचाएँ १. (नः) = हमें (दधन्तु) = धारण करें। (नः) =हमारे (इमं लोकम्) = इस लोक का तो (दधन्तु) = पोषण करें हीं, (अथ उ) = और निश्चय से (अमुं लोकम्) = परलोक का भी दधन्तु=धारण करें। हमारे इस लोक को ये रसमय बनाएँ तो हमारे परलोक को मोक्षामृत प्राप्त करानेवाला करें। २. ये (नः) = हमारे (कामान्) = इष्ट कामों को (समर्धयन्तु) = समृद्ध करनेवाली हों। इस लोक में हमें इष्ट काम्य पदार्थों को ये प्राप्त करानेवाली हों। इनके अन्दर दिया गया विज्ञान हमें प्राकृतिक पदार्थों का सुखमय उपयोग करने में सशक्त करे तथा ३. (देवैः) = दिव्य गुणोंवाले पुरुषों से (समाहृताः) = संगृहीत हुई-हुई ये पावमानी ऋचाएँ (देवीः) = सचमुच हमें दिव्य बनानेवाली हों। इनके द्वारा हमारा जीवन ऊँचा और ऊँचा होता चले। इस लोक में ये हमें वैज्ञानिक उन्नति द्वारा अभीष्ट पदार्थ प्राप्त कराके अभ्युदय को प्राप्त करनेवाला बनाएँ, और ज्ञान से हमारे जीवनों को दिव्य गुणयुक्त करती हुई परलोक में हमारे निःश्रेयस को सिद्ध करें।

भावार्थ -

पावमानी ऋचाएँ हमारे अभ्युदय और निःश्रेयस की साधक हों।

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