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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1301
    ऋषिः - पवित्र आङ्गिरसो वा वसिष्ठो वा उभौ वा देवता - पवमानाध्येता छन्दः - अनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः काण्ड नाम -
    42

    पा꣣वमानी꣡र्द꣢धन्तु न इ꣣मं꣢ लो꣣क꣡मथो꣢꣯ अ꣣मु꣢म् । का꣢मा꣣न्त्स꣡म꣢र्धयन्तु नो दे꣣वी꣢र्दे꣣वैः꣢ स꣣मा꣡हृ꣢ताः ॥१३०१

    स्वर सहित पद पाठ

    पा꣣वमानीः꣢ । द꣣धन्तु । नः । इम꣢म् । लो꣣क꣢म् । अ꣡थ꣢꣯ । उ꣣ । अमु꣢म् । का꣡मा꣢꣯न् । सम् । अ꣣र्धयन्तु । नः । देवीः꣡ । दे꣣वैः꣡ । स꣣मा꣡हृ꣢ताः । स꣣म् । आ꣡हृ꣢꣯ताः ॥१३०१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पावमानीर्दधन्तु न इमं लोकमथो अमुम् । कामान्त्समर्धयन्तु नो देवीर्देवैः समाहृताः ॥१३०१


    स्वर रहित पद पाठ

    पावमानीः । दधन्तु । नः । इमम् । लोकम् । अथ । उ । अमुम् । कामान् । सम् । अर्धयन्तु । नः । देवीः । देवैः । समाहृताः । सम् । आहृताः ॥१३०१॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1301
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 8; मन्त्र » 4
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 7; सूक्त » 1; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में वेदाध्ययन से हमें क्या प्राप्त हो, यह आकाङ्क्षा व्यक्त की गयी है।

    पदार्थ

    (पावमानीः) पवमान देवतावाली ऋचाएँ (नः) हमारे (इमं लोकम्) इहलोक को (अथ उ) और (अमुम्) परलोक को (दधन्तु) सहारा लगाएँ। (देवैः) वेदवेत्ता विद्वानों द्वारा (समाहृताः) पढ़ायी गयी वे (देवीः) अर्थप्रकाशक ऋचाएँ (नः) हमारे (कामान्) मनोरथों को (समर्द्धयन्तु) पूर्ण करें ॥४॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को चाहिए कि वे वेदों के अध्ययन से स्फूर्ति और सत्प्रेरणा प्राप्त कर इस लोक को, परलोक को और सब मनोरथों को समृद्ध करें ॥४॥

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    पदार्थ

    (पावमानीः) पवमान—सोम—परमात्मा की स्तुतियाँ (नः) हमारे लिये (इमं लोकम्-अथ-उ-अमुम्) इस पृथिवी लोक अर्थात् आभ्युदयिक जीवन को और उस लोक—मोक्षधाम अर्थात् निःश्रेयस-अध्यात्म जीवन को (दधन्तु) धारण करावें (देवीः) दिव्य गुण वाली वे स्तुतियाँ (देवैः समाहृताः) जीवन्मुक्तों द्वारा संज्ञापित—समझाई सिखाई हुईं (नः) हमारी (कामान् समर्धयन्तु) कामनाओं को समृद्ध करें—सफल करें॥४॥

    विशेष

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    विषय

    'यह लोक' और 'परलोक'

    पदार्थ

    (पावमानीः) = हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाली ये ऋचाएँ १. (नः) = हमें (दधन्तु) = धारण करें। (नः) =हमारे (इमं लोकम्) = इस लोक का तो (दधन्तु) = पोषण करें हीं, (अथ उ) = और निश्चय से (अमुं लोकम्) = परलोक का भी दधन्तु=धारण करें। हमारे इस लोक को ये रसमय बनाएँ तो हमारे परलोक को मोक्षामृत प्राप्त करानेवाला करें। २. ये (नः) = हमारे (कामान्) = इष्ट कामों को (समर्धयन्तु) = समृद्ध करनेवाली हों। इस लोक में हमें इष्ट काम्य पदार्थों को ये प्राप्त करानेवाली हों। इनके अन्दर दिया गया विज्ञान हमें प्राकृतिक पदार्थों का सुखमय उपयोग करने में सशक्त करे तथा ३. (देवैः) = दिव्य गुणोंवाले पुरुषों से (समाहृताः) = संगृहीत हुई-हुई ये पावमानी ऋचाएँ (देवीः) = सचमुच हमें दिव्य बनानेवाली हों। इनके द्वारा हमारा जीवन ऊँचा और ऊँचा होता चले। इस लोक में ये हमें वैज्ञानिक उन्नति द्वारा अभीष्ट पदार्थ प्राप्त कराके अभ्युदय को प्राप्त करनेवाला बनाएँ, और ज्ञान से हमारे जीवनों को दिव्य गुणयुक्त करती हुई परलोक में हमारे निःश्रेयस को सिद्ध करें।

    भावार्थ

    पावमानी ऋचाएँ हमारे अभ्युदय और निःश्रेयस की साधक हों।

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    विषय

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    भावार्थ

    (पावमानीः) पवमान सोम-सम्बन्धी ऋचाएं ही (नः) हमें (इमं) इस (लोकं) लोक (अथो) और (अमुं लोकं) परलोक को (दधन्तु) धारण करावें। और वे (देवीः) दिव्यगुण प्रकाशक होकर (देवैः) विद्वान् ज्ञानी पुरुषों द्वारा (समाहृताः) उपदेशों और व्याख्यानों द्वारा सर्वत्र प्रकाशित होकर (नः) हमारे (कामान्) शुभसंकल्पों को (समर्धयन्तु) पूर्ण करें।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१ पराशरः। २ शुनःशेपः। ३ असितः काश्यपो देवलो वा। ४, ७ राहूगणः। ५, ६ नृमेधः प्रियमेधश्च। ८ पवित्रो वसिष्ठौ वोभौ वा। ९ वसिष्ठः। १० वत्सः काण्वः। ११ शतं वैखानसाः। १२ सप्तर्षयः। १३ वसुर्भारद्वाजः। १४ नृमेधः। १५ भर्गः प्रागाथः। १६ भरद्वाजः। १७ मनुराप्सवः। १८ अम्बरीष ऋजिष्वा च। १९ अग्नयो धिष्ण्याः ऐश्वराः। २० अमहीयुः। २१ त्रिशोकः काण्वः। २२ गोतमो राहूगणः। २३ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः॥ देवता—१—७, ११-१३, १६-२० पवमानः सोमः। ८ पावमान्यध्येतृस्तृतिः। ९ अग्निः। १०, १४, १५, २१-२३ इन्द्रः॥ छन्दः—१, ९ त्रिष्टुप्। २–७, १०, ११, १६, २०, २१ गायत्री। ८, १८, २३ अनुष्टुप्। १३ जगती। १४ निचृद् बृहती। १५ प्रागाथः। १७, २२ उष्णिक्। १२, १९ द्विपदा पंक्तिः॥ स्वरः—१, ९ धैवतः। २—७, १०, ११, १६, २०, २१ षड्जः। ८, १८, २३ गान्धारः। १३ निषादः। १४, १५ मध्यमः। १२, १९ पञ्चमः। १७, २२ ऋषभः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ वेदाध्ययनेन किं स्यादित्याकाङ्क्षते।

    पदार्थः

    (पावमानीः) पवमानदेवताका ऋचः (नः) अस्माकम् (इमं लोकम्) इहलोकम् (अथ उ) अपि च (अमुम्) परलोकम् (दधन्तु) धारयन्तु। [दध धारणे भ्वादिः, व्यत्ययेन परस्मैपदम्।] (देवैः) वेदविद्भिः (समाहृताः) अध्यापिताः ताः (देवीः) देव्यः अर्थप्रकाशिका ऋचः (नः) अस्माकम् (कामान्) मनोरथान् (समर्द्धयन्तु) पूरयन्तु ॥४॥

    भावार्थः

    वेदाध्ययनेन जनाः स्फूर्तिं सत्प्रेरणां च प्राप्येमं च लोकममुं च लोकं सर्वांश्च कामान् समर्द्धयितुमर्हन्ति ॥४॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    So may the divine, purifying Soma hymns bestow on us this world and the next. May they preached by the learned gratify our hearts’ desires.

    Translator Comment

    Soma verses mean the verses pertaining to God and soul.

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    Meaning

    Divine, vibrant, flowing and sanctifying verses received and preserved by divine sages may, we pray, beautify this world of ours and also that other beyond and fulfil our will and purpose of Purushartha, active living here and the freedom of Nihshreyas, Moksha in the next.

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (पावमानीः) પવમાન સોમ પરમાત્માની સ્તુતિઓ (नः) અમારે માટે (इमं लोकम् अथ उ अमुम्) આ પૃથિવીલોક અર્થાત્ આભ્યદયિક જીવનને અને તે લોક મોક્ષધામ અર્થાત નિઃ શ્રેયસ - અધ્યાત્મ જીવનને (दधन्तु) ધારણ કરાવે (देवीः) દિવ્યગુણવાળી તે સ્તુતિઓ (देवैः समाहताः) જીવનમુક્તો દ્વારા સંપાદિત સમજાવેલી શીખવેલી (नः) અમારી (कामान् समर्धयन्तु) કામનાઓને સમૃદ્ધ કરે - સફળ કરે. (૪)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    माणसांनी वेदाच्या अध्ययनाने स्फूर्ती व सत्प्रेरणा प्राप्त करून हा लोक व परलोक तसेच सर्व मनोरथ समृद्ध करावेत. ॥४॥

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