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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1345
ऋषिः - मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः देवता - इन्द्रः छन्दः - अनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः काण्ड नाम -
4

य꣢꣫त्सानोः꣣ सा꣡न्वारु꣢꣯हो꣣ भू꣡र्यस्प꣢꣯ष्ट꣣ क꣡र्त्व꣢म् । त꣢꣫दिन्द्रो꣣ अ꣡र्थं꣢ चेतति यू꣣थे꣡न꣢ वृ꣣ष्णि꣡रे꣢जति ॥१३४५॥

स्वर सहित पद पाठ

य꣢त् । सा꣡नोः꣢꣯ । सा꣡नु꣢꣯ । आ꣡रु꣢꣯हः । आ꣣ । अ꣡रुहः꣢꣯ । भू꣡रि꣢꣯ । अ꣡स्प꣢꣯ष्ट । क꣡र्त्व꣢꣯म् । तत् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । अ꣡र्थ꣢꣯म् । चे꣣तति । यूथे꣡न꣢ । वृ꣣ष्णिः꣢ । ए꣣जति ॥१३४५॥


स्वर रहित मन्त्र

यत्सानोः सान्वारुहो भूर्यस्पष्ट कर्त्वम् । तदिन्द्रो अर्थं चेतति यूथेन वृष्णिरेजति ॥१३४५॥


स्वर रहित पद पाठ

यत् । सानोः । सानु । आरुहः । आ । अरुहः । भूरि । अस्पष्ट । कर्त्वम् । तत् । इन्द्रः । अर्थम् । चेतति । यूथेन । वृष्णिः । एजति ॥१३४५॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1345
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 23; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 12; सूक्त » 3; मन्त्र » 2
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पदार्थ -

उन्नति के मार्ग पर आगे और आगे बढ़ता हुआ १. (यत्) = जब यह साधक (सानो: सानु आरुहः) = एक पर्वत शिखर से अगले पर्वत शिखर पर चढ़ता है, अर्थात् जब योग की एक भूमिका से अगली भूमिका में प्रवेश करता है तब २. यह (कर्त्वम्) = अपने कर्त्तव्य को (भूरि अस्पष्ट) = खूब ही स्पष्ट रूप से देखता है [स्पश् to see, behold, perceive] । हम जितना-जितना साधना के मार्ग पर आगे बढ़ते चलेंगे उतना ही हमें अपना कर्त्तव्य-पथ स्पष्ट दिखेगा । ३. (तत्) = तभी (इन्द्रः) = यह इन्द्रियवृत्तियों को आत्मवश्य करनेवाला आत्मा (अर्थम्) = वस्तुतत्त्व को (चेतति) = ठीक-ठीक जानता है । संसार की वास्तविकता को समझने के लिए भी योगमार्ग पर चलना आवश्यक है। इस मार्ग पर चले बिना हम आत्मा और अनात्मा के, अशुचि व शुचि के, अनित्य व नित्य के और सुख व दु:ख के स्वरूप में

विवेक नहीं कर पाते । ४. इस वस्तुतत्त्व को जानकर यह साधक (वृष्णिः) = शक्तिशाली होता हुआ तथा सबपर सुखों की वर्षा करनेवाला बनकर (यूथेन) = जनसमूह के साथ ही (एजति) = गतिवाला होता है । यह लोगों से दूर भागने का विचार नहीं करता । लोगों में ही रहता हुआ उनके अज्ञान व दुःख को करने के लिए यत्नशील होता है।

सबके लिए माधुर्यमय इच्छाओंवाला यह 'मधुच्छन्दाः' सबका मित्र ‘वैश्वामित्र' होता है। यह केवल अपने ही हित को नहीं चाहता।

भावार्थ -

हम योग की भूमिकाओं में आगे और आगे बढ़ें, अपने कर्त्तव्य को अधिक स्पष्ट रूप में देखें, वस्तुतत्त्व को पहचानें और शक्तिशाली बनकर जनसमूह के साथ ही रहते हुए उन्हें उन्नत करें ।
 

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