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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1425
ऋषिः - रेणुर्वैश्वामित्रः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - जगती स्वरः - निषादः काण्ड नाम -
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ते꣡ अ꣢स्य सन्तु के꣣त꣡वोऽमृ꣢꣯त्य꣣वो꣡ऽदा꣢भ्यासो ज꣣नु꣡षी꣢ उ꣣भे꣡ अनु꣢꣯ । ये꣡भि꣢र्नृ꣣म्णा꣡ च꣢ दे꣣꣬व्या꣢꣯ च पुन꣣त꣡ आदिद्राजा꣢꣯नं म꣣न꣡ना꣢ अगृभ्णत ॥१४२५॥

स्वर सहित पद पाठ

ते । अ꣣स्य । सन्तु । केत꣡वः꣢ । अ꣡मृ꣢꣯त्यवः । अ । मृ꣣त्यवः । अ꣡दा꣣भ्यासः । अ । दा꣣भ्यासः । जनु꣢षी꣣इ꣡ति꣢ । उ꣣भे꣡इति꣢ । अ꣡नु꣢꣯ । ये꣡भिः꣢꣯ । नृ꣢म्णा꣢ । च꣣ । देव्या꣢꣯ । च꣣ । पुनते꣢ । आत् । इत् । रा꣡जा꣢꣯नम् । म꣣न꣡नाः꣢ । अ꣣गृभ्णत ॥१४२५॥


स्वर रहित मन्त्र

ते अस्य सन्तु केतवोऽमृत्यवोऽदाभ्यासो जनुषी उभे अनु । येभिर्नृम्णा च देव्या च पुनत आदिद्राजानं मनना अगृभ्णत ॥१४२५॥


स्वर रहित पद पाठ

ते । अस्य । सन्तु । केतवः । अमृत्यवः । अ । मृत्यवः । अदाभ्यासः । अ । दाभ्यासः । जनुषीइति । उभेइति । अनु । येभिः । नृम्णा । च । देव्या । च । पुनते । आत् । इत् । राजानम् । मननाः । अगृभ्णत ॥१४२५॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1425
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 17; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 12; खण्ड » 5; सूक्त » 4; मन्त्र » 3
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पदार्थ -

१. इस रेणु ने ज्ञान के भक्षण के द्वारा जो ज्ञान की किरणें प्राप्त की हैं (अस्य) = इसकी ते (केतवः) = वे ज्ञान-किरणें (अमृत्यवः) = इसके शरीर को असमय में नष्ट न होने देनेवाली तथा (अदाभ्यास:) = इसके मन को वासनाओं से मलिन न होने देनेवाली [Undefiled, pure] (सन्तु) = हों । (उभे) = दोनों (जनुषी) = जीवनों को—भौतिक तथा आध्यात्मिक जीवन को (अनु) = लक्ष्य करके ये उसे (अमृत्यवः) = रोगों से आक्रान्त न होने देनेवाली तथा (अदाभ्यासः) = वासनाओं से हिंसित न [Uninjured] होने देनेवाली हैं । ज्ञान की किरणों का भौतिक जीवन पर प्रभाव यह है कि मनुष्य मर्यादित जीवनवाला होकर रोगों का शिकार नहीं होता तथा आध्यात्मिक जीवन पर इसका प्रभाव यह है कि वासनाएँ इसपर आक्रमण नहीं कर पाती ।

२. ये ज्ञान की किरणें वे हैं (येभिः) = जिनसे ये अपने (नृम्णा) = शक्ति, साहस व धनों [Strength, courge, wealth] को (च) = तथा (देव्या) = दिव्य गुणों को (पुनते) = पवित्र कर लेते हैं । ये ज्ञान के कारण हीनाकर्षण से दूर रहकर निकृष्ट सुखों का भोग नहीं करते और इनके दिव्य गुण और अधिक दीप्त हो उठते हैं। परिणामतः इनकी शक्ति ठीक बनी रहती है ।

३. (आत् इत्) = इन दो बातों के अनन्तर ये रेणु वैश्वामित्र लोग (मनना:) = मननशील होकर प्रभु के नामों का मनन करते हुए (राजानम्) = सम्पूर्ण संसार को नियमित [regulate] करनेवाले देदीप्यमान [राजा=व्यवस्थापक, देदीप्यमान] प्रभु को (अगृभ्णत) = ग्रहण करते हैं । प्रभु की प्राप्ति के लिए ज्ञान के द्वारा अपने धनों, शक्तियों व गुणों को पवित्र करना आवश्यक है ।

भावार्थ -

हम अपने धनों, बलों व गुणों के मापक को ऊँचा करके मनन द्वारा प्रभु को प्राप्त 
करने का प्रयत्न करें ।

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