Loading...

सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1439
ऋषिः - कविर्भार्गवः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
3

प꣡व꣢मानो असिष्यद꣣द्र꣡क्षा꣢ꣳस्यप꣣ज꣡ङ्घ꣢नत् । प्र꣣त्नव꣢द्रो꣣च꣢य꣣न्रु꣡चः꣢ ॥१४३९॥

स्वर सहित पद पाठ

प꣡व꣢꣯मानः । अ꣣सिष्यदत् । र꣡क्षा꣢꣯ꣳसि । अ꣣पज꣡ङ्घ꣢नत् । अ꣣प । ज꣡ङ्घ꣢꣯नत् । प्र꣣त्नव꣢त् । रो꣣च꣡यन् । रु꣡चः꣢꣯ ॥१४३९॥


स्वर रहित मन्त्र

पवमानो असिष्यदद्रक्षाꣳस्यपजङ्घनत् । प्रत्नवद्रोचयन्रुचः ॥१४३९॥


स्वर रहित पद पाठ

पवमानः । असिष्यदत् । रक्षाꣳसि । अपजङ्घनत् । अप । जङ्घनत् । प्रत्नवत् । रोचयन् । रुचः ॥१४३९॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1439
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 5
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 13; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 5
Acknowledgment

पदार्थ -

शरीर में सात्त्विक अन्न से उत्पन्न होनेवाली शक्ति ‘सोम' है । यह हमारे जीवनों में पवित्रता के सञ्चार का कारण बनती है, अत: 'पवमान' नामवाली होती है। ये (पवमानः) = पवित्रता करनेवाले सोम हमारे शरीरों में (रक्षांसि) = अपने रमण के लिए औरों का क्षय करनेवाले रोग-कृमिरूप राक्षसों को (अपजंघनत्) = नष्ट करके दूर करता हुआ (असिष्यदत्) = बहता है । [स्यन्दू – प्रस्रवणे] । यह शरीर को नीरोग करके (प्रत्नवत्) = पहले की भाँति (रुचः) = कान्तियों को (रोचयन्) = चमका देता है। हमारे शरीर पहले प्रकृत अवस्था में जैसे चमकते थे वैसे ही अब नीरोग होकर फिर चमक उठते हैं । १. सोम के अभाव में रोगकृमियों ने हमारे शरीर पर अपना अधिकार कर लिया था, परन्तु इस सोम ने उनका बुरी तरह संहार कर दिया है। अब शरीर फिर पहले की भाँति चमकने लगा है। २. सोम के अभाव में राक्षसी वृत्तियों ने मन को भी मलिन कर दिया था। अब इस सुरक्षित सोम ने इन राक्षसी वृत्तियों को समाप्त करके मन व हृदय को पवित्र व उज्वल बना दिया है । ३. ईंधन न मिलने से ज्ञानाग्नि भी बुझ-सी चली थी, पर अब इस सोमरूप ईंधन को पाकर ज्ञानाग्नि भी दीप्त हो उठी है। एवं, क्या शरीर, क्या हृदय, और क्या मस्तिष्क सभी की कान्तियाँ पहले की भाँति फिर से खूब चमक उठी हैं। सोम ने हमारे शरीर, हृदय व मस्तिष्क सभी को ‘रोचिष्मान्'–कान्तिवाला बना दिया है। इस प्रकार शरीर, मन व बुद्धि की शक्तियों को उज्ज्वल बनाकर यह व्यक्ति भार्गव— तेजस्वी तो बना ही है साथ ही बुद्धि की तीव्रता ने इसे क्रान्तदर्शी भी बना दिया है। एवं, मन्त्र का ऋषि यह ‘कविर्भार्गव' अन्वर्थ नामवाला है ।

भावार्थ -

सोमरक्षा से राक्षसों का संहार हो, पहले की भाँति हमारे जीवन-गगन में ज्योतियाँ चमक उठें।

इस भाष्य को एडिट करें
Top