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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1467
ऋषिः - यजत आत्रेयः देवता - मित्रावरुणौ छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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वृ꣣ष्टि꣡द्या꣢वा री꣣꣬त्या꣢꣯पे꣣ष꣢꣫स्पती꣣ दा꣡नु꣢मत्याः । बृ꣣ह꣢न्तं꣣ ग꣡र्त꣢माशाते ॥१४६७॥

स्वर सहित पद पाठ

वृ꣣ष्टि꣡द्या꣢वा । वृ꣣ष्टि꣢ । द्या꣣वा । रीत्या꣢꣯पा । री꣣ति꣢ । आ꣣पा । इ꣢षः । प꣢꣯तीइ꣡ति꣢ । दा꣡नु꣢꣯मत्याः । बृ꣣ह꣡न्त꣢म् । ग꣡र्त꣢꣯म् । आ꣣शातेइ꣡ति꣢ ॥१४६७॥


स्वर रहित मन्त्र

वृष्टिद्यावा रीत्यापेषस्पती दानुमत्याः । बृहन्तं गर्तमाशाते ॥१४६७॥


स्वर रहित पद पाठ

वृष्टिद्यावा । वृष्टि । द्यावा । रीत्यापा । रीति । आपा । इषः । पतीइति । दानुमत्याः । बृहन्तम् । गर्तम् । आशातेइति ॥१४६७॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1467
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 11; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 13; खण्ड » 4; सूक्त » 4; मन्त्र » 3
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पदार्थ -

ये प्राणापान साधना करनेवाले के समाधि की स्थिति में पहुँचने पर – धर्ममेघ समाधि में (वृष्टिद्यावा) = मस्तिष्करूप द्युलोक से आनन्द-कणिकाओं की वृष्टि करानेवाले होते हैं । (रीत्यापा) = ये प्राणापान रेतरूप जलों की ऊर्ध्वगति के [री= गतौ] कारण बनते हैं । इस प्रकार एक उच्चक्षेत्र में विचरने से मनुष्य का मन धन के प्रति उतनी आसक्तिवाला नहीं होता और इस साधक के प्राणापान (दानुमत्याः) = सदा दान के देनेवाली (इष:) = इच्छा के (पती) = स्वामी होते हैं, अर्थात् इसकी वृत्ति दानप्रवण बनी रहती है। अन्त में ये प्राणापान इस साधक को धनासक्ति से ऊपर उठाकर (बृहन्तं गर्तम्) = उस परमपुरुष को (आशाते) = प्राप्त कराते हैं। [पुरुषो गर्त: श० ५.४.१.१५] । नि० ३.४ में ‘गर्त' गृह का नाम है। प्राणापान इस पुरुष को महान् घर को प्राप्त कराते हैं – यह महान् घर भी 'प्रभु' ही हैं । जीव का वास्तविक घर तो प्रभु हैं – यहाँ तो यह यात्रा पर आया हुआ है । प्राणापान की साधना से यह भटकता नहीं और यात्रा को ठीक समाप्त कर काम, क्रोध, लोभ में न फँसकर [आत्रेय] प्रभु से फिर जा मिलता है [यजतः] । एवं प्रभु से मेल करनेवाला यह सचमुच 'यजत' होता है ।

भावार्थ -

हम प्राणापान की साधना से १. धर्ममेघ समाधि के आनन्द का अनुभव करें, २. ऊर्ध्वरेतस् बनें, ३. धनासक्ति से ऊपर उठें और ४. प्रभु से जा मिलें।
 

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