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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 147
ऋषिः - गोतमो राहूगणः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
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अ꣢꣫त्राह꣣ गो꣡र꣢मन्वत꣣ ना꣢म꣣ त्व꣡ष्टु꣢रपी꣣꣬च्य꣢꣯म् । इ꣣त्था꣢ च꣣न्द्र꣡म꣢सो गृ꣣हे꣢ ॥१४७॥
स्वर सहित पद पाठअ꣡त्र꣢꣯ । अ꣡ह꣢꣯ । गोः । अ꣣मन्वत । ना꣡म꣢꣯ । त्व꣡ष्टुः꣢꣯ । अ꣣पीच्य꣢꣯म् । इ꣣त्था꣢ । च꣣न्द्र꣡म꣢सः । च꣣न्द्र꣢ । म꣣सः । गृहे꣢ ॥१४७॥
स्वर रहित मन्त्र
अत्राह गोरमन्वत नाम त्वष्टुरपीच्यम् । इत्था चन्द्रमसो गृहे ॥१४७॥
स्वर रहित पद पाठ
अत्र । अह । गोः । अमन्वत । नाम । त्वष्टुः । अपीच्यम् । इत्था । चन्द्रमसः । चन्द्र । मसः । गृहे ॥१४७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 147
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 1; मन्त्र » 3
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 4;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 1; मन्त्र » 3
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 4;
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विषय - चन्द्रमा के घर में
पदार्थ -
इस मन्त्र का ऋषि ‘गोतम राहूगण' है- [गो-इन्द्रिय, तम= अत्यन्त प्रशस्त, रह्-त्यागे, गण=संख्याने] यह अत्यन्त प्रशस्त - इन्द्रियोंवाला है और वह ऐसा इसलिए बन पाया है कि त्यागवृत्तिवालों में उसका स्थान गणना के योग्य है। यह त्याग की भावना मनुष्य के अन्दर तब आती है जब वह (अत्र) = इस मानव जीवन मे (ह) = निश्चय से (अपीच्यम्) = अत्यन्त सुन्दर व सुगुप्त (नाम) = यशप्रद प्रभूनाम का (गो:) = वेदवाणी द्वारा (अमन्वत) = मनन करता है। वेदवाणी के अध्ययन से जब वह अपराविद्या को प्राप्त करता है तो उसे इन प्राकृतिक वस्तुओं में उस प्रभु की अद्भुत रचनाशक्ति दीखने लगती है। एक-एक पदार्थ उसके लिए एक आश्चर्य [miracle] हो जाता है। स्वयं वेद - वाक्यों की रचना भी उसे अनुपम बुद्धि से की गई प्रतीत होती है। (इत्था)=ऐसा अनुभव वह तब करता है जब वह (चन्द्रमसः) = मन के [चन्द्रमा मनसो जात:, मन=moon] (गृहे) = गृह में स्थान में स्थित होता है, अर्थात् मनुष्य क्षणभर भी विषयों से उपराम होकर अपने अन्तर मानस में स्थित हुआ और उसे प्रभु की महिमा का ध्यान आया। विषयों में स्थित होने पर भोगवृत्ति बढ़ती है, मन में स्थित होने पर विज्ञानवृत्ति, अतः मनुष्य को चाहिए कि भोगवृत्ति का त्याग करके [रह् - त्याग ] अपने मन व इन्द्रियों को निर्मल बनाये और वेदवाणी के द्वारा इस जगत् में प्रभु की महिमा को देखे।
भावार्थ -
मनीषी बनकर हम मन से उस प्रभु की महिमा को देखने का प्रयत्न करें।
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