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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1478
ऋषिः - विश्वामित्रो गाथिनः
देवता - अग्निः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
1
वा꣣जी꣡ वाजे꣢꣯षु धीयतेऽध्व꣣रे꣢षु꣣ प्र꣡ णी꣢यते । वि꣡प्रो꣢ य꣣ज्ञ꣢स्य꣣ सा꣡ध꣢नः ॥१४७८॥
स्वर सहित पद पाठवा꣣जी꣢ । वा꣡जे꣢꣯षु । धी꣣यते । अध्वरे꣡षु꣢ । प्र । नी꣣यते । वि꣡प्रः꣢꣯ । वि । प्रः꣣ । यज्ञ꣡स्य꣢ । सा꣡ध꣢꣯नः ॥१४७८॥
स्वर रहित मन्त्र
वाजी वाजेषु धीयतेऽध्वरेषु प्र णीयते । विप्रो यज्ञस्य साधनः ॥१४७८॥
स्वर रहित पद पाठ
वाजी । वाजेषु । धीयते । अध्वरेषु । प्र । नीयते । विप्रः । वि । प्रः । यज्ञस्य । साधनः ॥१४७८॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1478
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 15; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 13; खण्ड » 5; सूक्त » 3; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 15; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 13; खण्ड » 5; सूक्त » 3; मन्त्र » 2
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विषय - वाज, अध्वर, यज्ञ
पदार्थ -
जो व्यक्ति सचमुच 'उशना : ' = प्रभु के गुणों की प्राप्ति की प्रबल कामनावाला होता है तथा ‘काव्यः'=अर्थतत्त्व [वास्तविकता] को जानकर चलता है, वह १. (वाजी) = शक्तिशाली बनता हैऔर (वाजेषु) = शक्तिशाली कामों में (धीयते) = सदा रक्खा जाता है । यह संसार में सदा क्रियाशील जीवनवाला होता है । यह क्रियाशीलता ही इसके वासनाओं से बचे रहकर शक्तिशाली बनने का रहस्य बनती है। २. (अध्वरेषु) = हिंसारहित यज्ञों में यह (प्रणीयते) = आगे और आगे ले जाया जाता है। हिंसारहित कर्मों को करता हुआ यह जीवन में उन्नति-पथ पर आगे बढ़ता है । ३. (विप्रः) = यह विशेषरूप से अपना पूरण करनेवाला होता है और ४. (यज्ञस्य साधन:) = लोकहित के श्रेष्ठतम कर्मों को सिद्ध करनेवाला होता है ।
भावार्थ -
हम शक्तिशाली कर्मों में लगे रहें, अहिंसा के मार्ग पर आगे बढ़ें, अपनी न्यूनताओं को दूर कर अपना पूरण करनेवाले हों-लोकहित के कार्यों में प्रवृत्त हों।
टिप्पणी -
नोट–‘वाज, अध्वर और यज्ञ' तीनों ही शब्द यज्ञ के लिए प्रयुक्त होते हैं । यहाँ उनमें इस प्रकार भेद करके दिखाया गया है १. वाज शक्तिशाली कर्म हैं, २. अध्वर — अहिंसा का मार्ग है और ३. यज्ञ लोकहित के लिए किये गये श्रेष्ठतम कर्म हैं ।