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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1499
ऋषिः - शुनःशेप आजीगर्तिः देवता - अग्निः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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आ꣡ नो꣢ भज पर꣣मे꣡ष्वा वाजे꣢꣯षु मध्य꣣मे꣡षु꣢ । शि꣢क्षा꣣ व꣢स्वो꣣ अ꣡न्त꣢मस्य ॥१४९९॥

स्वर सहित पद पाठ

आ꣢ । नः꣣ । भज । परमे꣡षु꣢ । आ । वाजे꣡षु꣢꣯ । म꣣ध्यमे꣡षु꣢ । शि꣡क्ष꣢꣯ । व꣡स्वः꣢꣯ । अ꣡न्त꣢꣯मस्य ॥१४९९॥


स्वर रहित मन्त्र

आ नो भज परमेष्वा वाजेषु मध्यमेषु । शिक्षा वस्वो अन्तमस्य ॥१४९९॥


स्वर रहित पद पाठ

आ । नः । भज । परमेषु । आ । वाजेषु । मध्यमेषु । शिक्ष । वस्वः । अन्तमस्य ॥१४९९॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1499
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 14; खण्ड » 1; सूक्त » 4; मन्त्र » 3
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पदार्थ -

हे प्रभो! आप (परमेषु वाजेषु) = उत्कृष्ट धनों में [वाज-wealth] (न:) = हमें (आभज) = सर्वथा भागी बनाइए। (मध्यमेषु वाजेषु) = मध्यम धनों में भी हमें भागवाला कीजिए । (अन्तमस्य) = बिल्कुल समीप के–सबसे निचले (वस्वः) = धन की भी हमें (शिक्ष) = देने की इच्छा कीजिए। [शक् to give, सन् प्रत्यय इच्छार्थ में ] ।

ज्ञान सर्वोत्तम धन है, बल मध्यम धन है और रुपया-पैसा सबसे निचले दर्जे का धन है । धन्य मनुष्य वही है जो ज्ञान, बल व धन तीनों से ही युक्त है । ज्ञान 'ब्राह्मणत्व' का प्रतीक है, बल ‘क्षत्रियत्व' का तथा धन 'वैश्यत्व' का । इस प्रकार उत्तम, मध्यम व अन्तम धनों को प्राप्त करके हम अपने जीवन को अधिक-से-अधिक सुखी बना पाते हैं । यह ठीक है कि–'हैं ये भी बन्धन ही'।‘शुनः शेप' इन्हीं तीनों बन्धनों से बँधा है। ज्ञान का बन्धन सात्त्विक है, बल का बन्धन राजस् तथा धन का बन्धन तामस् । इन तीनों बन्धनों में बन्धा हुआ भी यह अपने जीवन को सुखी बनाने में समर्थ होता है और 'शुन: शेप' नाम को चरितार्थ करता है । 

भावार्थ -

हम ज्ञानी, बली व धनी बनकर जीवन को सुखमय बनाएँ ।

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