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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1532
ऋषिः - विरूप आङ्गिरसः
देवता - अग्निः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
3
अ꣣ग्नि꣢र्मू꣣र्धा꣢ दि꣣वः꣢ क꣣कु꣡त्पतिः꣢꣯ पृथि꣣व्या꣢ अ꣣य꣢म् । अ꣣पा꣡ꣳ रेता꣢꣯ꣳसि जिन्वति ॥१५३२॥
स्वर सहित पद पाठअ꣣ग्निः꣢ । मू꣣र्धा꣢ । दि꣣वः꣢ । क꣣कु꣢त् । प꣡तिः꣢꣯ । पृ꣣थिव्याः꣢ । अ꣡य꣢म् । अ꣣पा꣢म् । रे꣡वा꣢꣯ꣳसि । जि꣢न्वति ॥१५३२॥
स्वर रहित मन्त्र
अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् । अपाꣳ रेताꣳसि जिन्वति ॥१५३२॥
स्वर रहित पद पाठ
अग्निः । मूर्धा । दिवः । ककुत् । पतिः । पृथिव्याः । अयम् । अपाम् । रेवाꣳसि । जिन्वति ॥१५३२॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1532
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 16; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 14; खण्ड » 4; सूक्त » 3; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 16; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 14; खण्ड » 4; सूक्त » 3; मन्त्र » 1
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विषय - विरूप आङ्गिरस
पदार्थ -
२७ संख्या पर इस मन्त्र का अर्थ इस प्रकार हैमन्त्र का ऋषि ‘विरूप'=विशिष्टरूपवाला ‘आङ्गिरस'=अङ्ग-प्रत्यङ्ग में रसवाला है। 'ऐसा क्यों ?' इसलिए कि वह -
१. (अग्निः) = आगे और आगे चलता है, २. (मूर्धा) = शिखर पर पहुँचता है, ३. (दिवः ककुत्) = ज्ञान के शिखर पर पहुँचनेवाला होता है, ४. (पृथिव्याः) = इस पार्थिव शरीर का (अयम्) = यह (पतिः) = पति = स्वामी होता है, अर्थात् जितेन्द्रिय होता है । यह ऐसा इसलिए बन पाया है कि (अपाम्) = जलों के सम्बन्धी (रेतांसि) = रेतस् की शक्ति को यह (जिन्वति) = अपने अन्दर प्रेरित करता है।
भावार्थ -
संयम द्वारा हम 'विरूप आङ्गिरस' बनें ।
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