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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1613
ऋषिः - पर्वतनारदौ
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - उष्णिक्
स्वरः - ऋषभः
काण्ड नाम -
3
स꣡ने꣢मि꣣ त्व꣢म꣣स्म꣡दा अदे꣢꣯वं꣣ कं꣡ चि꣢द꣣त्रि꣡ण꣢म् । सा꣣ह्वा꣡ꣳ इ꣢न्दो꣣ प꣢रि꣣ बा꣢धो꣣ अ꣡प꣢ द्व꣣यु꣢म् ॥१६१३॥
स्वर सहित पद पाठस꣡ने꣢꣯मि । त्वम् । अ꣣स्म꣢त् । आ । अ꣡दे꣢꣯वम् । अ । दे꣣वम् । क꣢म् । चि꣣त् । अत्रि꣡ण꣢म् । सा꣣ह्वा꣢न् । इ꣣न्दो । प꣡रि꣢꣯ । बा꣡धः꣢꣯ । अ꣡प꣢꣯ । द्व꣣यु꣢म् ॥१६१३॥
स्वर रहित मन्त्र
सनेमि त्वमस्मदा अदेवं कं चिदत्रिणम् । साह्वाꣳ इन्दो परि बाधो अप द्वयुम् ॥१६१३॥
स्वर रहित पद पाठ
सनेमि । त्वम् । अस्मत् । आ । अदेवम् । अ । देवम् । कम् । चित् । अत्रिणम् । साह्वान् । इन्दो । परि । बाधः । अप । द्वयुम् ॥१६१३॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1613
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 20; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 16; खण्ड » 4; सूक्त » 4; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 20; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 16; खण्ड » 4; सूक्त » 4; मन्त्र » 3
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विषय - यमों का पालन
पदार्थ -
‘सनेमि' शब्द के दो अर्थ हैं—'सनातन काल से' तथा 'शीघ्र' । जीव प्रभु से प्रार्थना करता है कि हे (इन्दो) = परमैश्वर्यवाले परम शक्तिशाली प्रभो ! (त्वम्) = आप (अस्मत्) = हमसे (सनेमि) = शीघ्र ही १. (अदेवम्) = देव-विरोधी भावना को, अर्थात् स्वार्थवश स्वयं सब-कुछ खा जाने की वृत्ति को (आसाह्वान्) = पूर्णरूप से पराभूत कर दीजिए । हमारा जीवन यज्ञमय हो– देव यज्ञप्रिय होते हैं । असुर
बिना यज्ञ किये सब कुछ स्वयं खा जाते हैं। हम असुर न बनें । २. (कंचित्) = किसी अवर्णनीय शक्तिवाले (अत्रिणम्) = हमें खा जानेवाले [अद्+तृन्] इस काम को भी (आसाह्वान्) = पूर्ण पराभूत कीजिए। हमारा जीवन ब्रह्मचर्यवृत्तिवाला हो । ३. (बाध:) = औरों की हिंसा करना, इस वृत्ति को (परि) = हमसे दूर कीजिए । हम अहिंसा वृत्तिवाले हों । ४. (द्वयुम्) = अन्दर कुछ और बाहर कुछ– इस दोपने को, असत्य की वृत्ति को भी (अप) = हमसे दूर भगाइए।
एवं, प्रभुकृपा से हम स्तेय, अब्रह्मचर्य, हिंसा व असत्य की वृत्तियों से दूर होकर अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अहिंसा व सत्य में प्रतिष्ठित होते हैं । यही तो पर्वत बनना है । ऐसा ही व्यक्ति 'नारद' हो सकता है ।
भावार्थ -
प्रभुकृपा से हममें यमों की प्रतिष्ठा हो ।
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