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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1618
ऋषिः - शुनःशेप आजीगर्तिः
देवता - अग्निः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
3
य꣢च्चि꣣द्धि꣡ शश्व꣢꣯ता꣣ त꣡ना꣢ दे꣣वं꣡दे꣢वं꣣ य꣡जा꣢महे । त्वे꣡ इद्धू꣢꣯यते ह꣣विः꣢ ॥१६१८॥
स्वर सहित पद पाठय꣢त् । चि꣣त् । हि꣢ । श꣡श्व꣢꣯ता । त꣡ना꣢꣯ । दे꣣वं꣡दे꣢वम् । दे꣣व꣢म् । दे꣣वम् । य꣡जा꣢꣯महे । त्वे꣡इति꣢ । इत् । हू꣣यते । हविः꣢ ॥१६१८॥
स्वर रहित मन्त्र
यच्चिद्धि शश्वता तना देवंदेवं यजामहे । त्वे इद्धूयते हविः ॥१६१८॥
स्वर रहित पद पाठ
यत् । चित् । हि । शश्वता । तना । देवंदेवम् । देवम् । देवम् । यजामहे । त्वेइति । इत् । हूयते । हविः ॥१६१८॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1618
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 17; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 17; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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विषय - प्रभु की उपासना-दिव्य गुणों को अपने साथ जोड़ना
पदार्थ -
हे प्रभो! (यत्) = जब हम चित् हि निश्चय से (शश्वता) = [शश् प्लुतगतौ] आलस्यशून्य क्रिया के द्वारा तथा (तना) = विस्तार के द्वारा (देवं देवं) = एक-एक दिव्य गुण को (यजामहे) = अपने साथ सङ्गत करते हैं, तब वह (त्वे इत्) = आपमें ही (हविः हूयते) = हवि डाली जा रही होती है, अर्थात् वह आपकी ही उपासना की जा रही होती है ।
उल्लिखित मन्त्रार्थ से स्पष्ट है कि १. प्रभु की उपासना का प्रकार यही है कि हम अपने साथ दिव्य गुणों का सम्बन्ध करें। जितना जितना हम दिव्यता को अपनाते हैं, उतना उतना ही प्रभु के उपासक बन रहे होते हैं । प्रभु की उपासना स्तोत्रों के उच्चारण व कीर्तन से नहीं हो जाती । उसके लिए तो जीवन को दिव्य बनाना होता है ।
२. दिव्यता प्राप्ति के साधनों का भी संकेत मन्त्र में 'शश्वता' तथा 'तना' शब्दों से किया गया है।‘आलस्यशून्य क्रिया' तथा 'विस्तार' ही वे दो उपाय हैं, जो हमें दिव्यता को अधिगत करने में सहायक होते हैं। अकर्मण्यता और संकुचित हृदय हमें दस्यु बनानेवाले हैं ।
भावार्थ -
हम क्रियाशील तथा हृदय के विस्तार के द्वारा दिव्य जीवनवाले बनें और इस प्रकार प्रभु के सच्चे उपासक हों ।
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