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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1691
ऋषिः - कलिः प्रागाथः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)
स्वरः - मध्यमः
काण्ड नाम -
4
व꣣य꣡मे꣢नमि꣣दा꣡ ह्योऽपी꣢꣯पेमे꣣ह꣢ व꣣ज्रि꣡ण꣢म् । त꣡स्मा꣢ उ अ꣣द्य꣡ सव꣢꣯ने सु꣣तं꣢ भ꣣रा꣢ नू꣣नं꣡ भू꣢षत श्रु꣣ते꣢ ॥१६९१॥
स्वर सहित पद पाठव꣣य꣢म् । ए꣣नम् । इदा꣢ । ह्यः । अ꣡पी꣢꣯पेम । इ꣣ह꣢ । व꣣ज्रि꣡ण꣢म् । त꣡स्मै꣢꣯ । उ꣣ । अद्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । स꣡व꣢꣯ने । सु꣣त꣢म् । भ꣣र । आ꣢ । नू꣣न꣢म् । भू꣣षत । श्रुते꣢ ॥१६९१॥
स्वर रहित मन्त्र
वयमेनमिदा ह्योऽपीपेमेह वज्रिणम् । तस्मा उ अद्य सवने सुतं भरा नूनं भूषत श्रुते ॥१६९१॥
स्वर रहित पद पाठ
वयम् । एनम् । इदा । ह्यः । अपीपेम । इह । वज्रिणम् । तस्मै । उ । अद्य । अ । द्य । सवने । सुतम् । भर । आ । नूनम् । भूषत । श्रुते ॥१६९१॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1691
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 13; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 18; खण्ड » 3; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 13; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 18; खण्ड » 3; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
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विषय - प्रभु का अध्ययन
पदार्थ -
२७२ संख्या पर इस मन्त्र का अर्थ इस प्रकार दिया गया है - (वयम्) = हम (इत्) = निश्चय से (आ) = सब प्रकार से (ह्यः) = जैसे कल उसी प्रकार इह आज के दिन भी (एनम्) = इस प्रभु को (अपीपेम) = आप्यायित करते हैं । वे प्रभु (वज्रिणम्) = वज्रवाले हैं । (तस्मा) = उस प्रभु के लिए (उ) = ही (अद्य) = आज (सवने) = यज्ञों में (सुतम्) = आहुतियों को (भर) = प्राप्त कराता हूँ और उस प्रभु की प्राप्ति के लिए (नूनम्) = निश्चय से (श्रुते) = ज्ञान के क्षेत्र में भूषत-अपने को अलंकृत करता हूँ ।
भावार्थ -
प्रभु-प्राप्ति के लिए हम ‘यज्ञों' तथा 'ज्ञान' के मार्ग को अपनाएँ।
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