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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1703
ऋषिः - विश्वामित्रः प्रागाथः
देवता - इन्द्राग्नी
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
4
प्र꣡ वा꣢मर्चन्त्यु꣣क्थि꣡नो꣢ नीथाविदो जरितारः । इन्द्राग्नी इष आ वृणे ॥१७०३
स्वर सहित पद पाठप्र꣢ । वा꣣म् । अर्चन्ति । उक्थि꣡नः꣢ । नी꣣थावि꣡दः꣢ । नी꣣थ । वि꣡दः꣢꣯ । ज꣣रिता꣡रः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नी꣢इति꣢ । इ꣡षः꣢꣯ । आ । वृ꣣णे ॥१७०३॥
स्वर रहित मन्त्र
प्र वामर्चन्त्युक्थिनो नीथाविदो जरितारः । इन्द्राग्नी इष आ वृणे ॥१७०३
स्वर रहित पद पाठ
प्र । वाम् । अर्चन्ति । उक्थिनः । नीथाविदः । नीथ । विदः । जरितारः । इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । इषः । आ । वृणे ॥१७०३॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1703
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 17; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 18; खण्ड » 4; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 17; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 18; खण्ड » 4; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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विषय - प्राणापान की अर्चना
पदार्थ -
गत मन्त्र में प्राणापान के लाभों का उल्लेख हो गया है, उनका ध्यान करते हुए 'विश्वामित्र' लोग हे प्राणापानो ! (वाम्) = आप दोनों की (प्र अर्चन्ति) = खूब अर्चना करते हैं। आप दोनों की अर्चना करनेवाले ये लोग
१. (उक्थिन:) = [वागुक्थम् – षड्० १.५] उत्तम वाणीवाले होते हैं । इनके मुख से कभी अशुभ शब्दों का उच्चारण नहीं होता
[अन्नम् उक्थानि–कौ० ११.८] सात्त्विक अन्नों के सेवन की वृत्तिवाले होते हैं। प्रजा वा उक्थानि—तै० १.८.७.२] ये उत्तम सन्तानवाले होते हैं। पशव [उक्थानि–ए० ४.१.१२] ये अपने घरों में उत्तम गाय आदि पशुओं के रखनेवाले
होते हैं । [उक्थमिति बवृचा उपासते – श० १०.५.२.२०] ये ऋग्वेद के द्वारा - विज्ञान के द्वारा प्रभु के उपासक होते हैं ।
२. (नीथाविदः) = [नीथान् विनयान् विन्दन्ति – दयानन्द] ये प्राणोपासक लोग जीवन-यात्रा के मार्ग [नय] को ठीक-ठीक समझते हुए बड़ी विनीतता से जीवन यापन करते हैं और इस प्रकार अपने उत्तम कर्मों के द्वारा [यजुर्वेद - कर्मवेद], अर्थात् यज्ञों के द्वारा प्रभु के उपासक बनते हैं ।
३. (जरितार:) = [जरते-स्तौति] ये सामों के द्वारा प्रभु का स्तवन करनेवाले होते हैं। इस प्रकार इनके जीवन में ऋग्, यजुः व साम तीनों ही का समावेश होता है, इसलिए विश्वामित्र कहता है कि हे (इन्द्राग्नी) = प्राणापानो ! मैं आपके द्वारा (इषः) = प्रभु की प्रेरणाओं का (आवृणे) = सर्वथा वरण करता हूँ । वेदों में उस परम अक्षर से दी गयी प्रेरणाओं को यह प्राणोपासक सुनता है। दूसरे शब्दों में इसे
भावार्थ -
मैं प्राणोपासक बनकर प्रभु की वाणी को सुननेवाला बनूँ ।
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