Loading...

सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1729
ऋषिः - प्रस्कण्वः काण्वः देवता - अश्विनौ छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
2

या꣢ द꣣स्रा꣡ सिन्धु꣢꣯मातरा मनो꣣त꣡रा꣢ रयी꣣णा꣢म् । धि꣣या꣢ दे꣣वा꣡ व꣢सु꣣वि꣡दा꣢ ॥१७२९॥

स्वर सहित पद पाठ

या꣢ । द꣣स्रा꣢ । सि꣡न्धु꣢꣯मातरा । सि꣡न्धु꣢꣯ । मा꣣तरा । मनोत꣡रा꣢ । र꣣यीणा꣢म् । धि꣣या꣢ । दे꣣वा꣢ । व꣣सुवि꣡दा꣢ । वसु꣣ । वि꣡दा꣢꣯ ॥१७२९॥


स्वर रहित मन्त्र

या दस्रा सिन्धुमातरा मनोतरा रयीणाम् । धिया देवा वसुविदा ॥१७२९॥


स्वर रहित पद पाठ

या । दस्रा । सिन्धुमातरा । सिन्धु । मातरा । मनोतरा । रयीणाम् । धिया । देवा । वसुविदा । वसु । विदा ॥१७२९॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1729
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 7; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 19; खण्ड » 2; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
Acknowledgment

पदार्थ -

ये प्राणापान तो वे हैं या-जो

नैर्मल्य- १. (दस्त्रा) = [दसु उपक्षये]=इन्द्रियों के सब दोषों को नष्ट करनेवाले हैं। ('तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात्') = । इन्द्रियों के दोष ही क्या, शरीर के रोगों तथा मन के मलों को भी ये दूर करनेवाले हैं, बुद्धि की कुण्ठा के भी ये विनाशक हैं । इन्हीं कारणों से [दस्रा-दर्शनीयौ] ये दर्शनीय व सुन्दर हैं ।

स्वास्थ्य – २. (सिन्धुमातरा) = ये शरीर में रुधिर के ठीक प्रकार से स्यन्दन = प्रवाह [सिन्धु] के निर्माण करनेवाले हैं। इनकी साधना से उच्च और निम्न रक्तचाप High and Low blood pressure नहीं होता तथा रुधिर का अभिसरण सदा ठीक चलता है। इसी कारण तो प्राणापान स्वास्थ्य के मूलकारण हो जाते हैं ।

धनलाभ – ३. ये प्राणापान (मनोतरा रयीणाम्) = मनोबल के द्वारा धन के बढ़ानेवाले हैं । तृ धातु का प्रयोग बढ़ाने अर्थ में 'प्रायः तारिष्टम्' इत्यादि मन्त्रभागों में स्पष्ट है । प्राणापान की साधना से चित्तवृत्तिनिरोध द्वारा मन की शक्ति दिव्य हो जाती है और उस दिव्य मानसशक्ति से हम जिस भी कार्य को करते हैं उसमें सफलता प्राप्त होती ही है। कर्मेन्द्रियों से कर्म करते हैं तो उसमें पूर्ण सफलता मिलती है – इन्द्रियों की शक्ति बढ़ती है। ज्ञानेन्द्रियों से ज्ञान प्राप्ति में लगते हैं तो ज्ञानधन की अद्भुत वृद्धि होती है। शक्ति और ज्ञान ही तो मनुष्य के उत्कृष्ट धन हैं। इनके लिए ही हम प्रभु से आराधना करते हैं—हे प्रभो! (‘इदं मे ब्रह्म च क्षत्रं चोभे श्रियमश्नुताम्') = मेरा ज्ञान बढ़े, मेरी शक्ति फूले-फले।

प्रभु-प्राप्ति –४. ये प्राणापान देवाः- देव हैं – दिव्य शक्ति सम्पन्न हैं । (धिया) = ज्ञानपूर्वक कर्मों के द्वारा ये (वसुविदा) = सारे ब्रह्माण्ड में बसनेवाले व ब्रह्माण्ड के निवासभूत प्रभु को ये प्राप्त करानेवाले हैं। आराधना से मनुष्य देव बन जाता है और उस महादेव को प्राप्त करने का उसका अधिकार हो जाता है। तीव्र बुद्धि से ही तो उसका दर्शन होना है, ('दृश्यते त्वग्यया बुद्ध्या') । ज्ञान व पवित्र कर्मों से ही प्रभु की अर्चना सम्पन्न होती है 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य'। एवं, ज्ञानपूर्वक कर्मों से ये हमें प्रभु तक पहुँचाते हैं।

भावार्थ -

प्राणापानों की साधना से १. इन्द्रियों में नैर्मल्य होगा, शरीर में स्वास्थ्य । २. शक्ति व ज्ञानधन की वृद्धि होगी तथा प्रभु की प्राप्ति के हम अधिकारी होंगे।

इस भाष्य को एडिट करें
Top