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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1744
ऋषिः - अवस्युरात्रेयः देवता - अश्विनौ छन्दः - पङ्क्तिः स्वरः - पञ्चमः काण्ड नाम -
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अ꣣त्या꣡या꣢तमश्विना ति꣣रो꣡ विश्वा꣢꣯ अ꣣ह꣡ꣳ सना꣢꣯ । द꣢स्रा꣣ हि꣡र꣢ण्यवर्तनी꣣ सु꣡षु꣢म्णा꣣ सि꣡न्धु꣢वाहसा꣣ मा꣢ध्वी꣣ म꣡म꣢ श्रुत꣣ꣳ ह꣡व꣢म् ॥१७४४॥

स्वर सहित पद पाठ

अ꣣त्या꣡या꣢तम् । अ꣣ति । आ꣡या꣢꣯तम् । अ꣣श्विना । तिरः꣢ । वि꣡श्वाः꣢꣯ । अ꣣ह꣢म् । स꣡ना꣢꣯ । द꣡स्रा꣢꣯ । हि꣡र꣢꣯ण्यवर्तनी । हि꣡र꣢꣯ण्य । व꣣र्तनीइ꣡ति꣢ । सु꣡षु꣢꣯म्णा । सु । सु꣣म्ना । सि꣡न्धु꣢꣯वाहसा । सि꣡न्धु꣢꣯ । वा꣣हसा । मा꣢ध्वी꣢꣯इ꣡ति꣢ । म꣡म꣢꣯ । श्रु꣣तम् । ह꣡व꣢꣯म् ॥१७४४॥


स्वर रहित मन्त्र

अत्यायातमश्विना तिरो विश्वा अहꣳ सना । दस्रा हिरण्यवर्तनी सुषुम्णा सिन्धुवाहसा माध्वी मम श्रुतꣳ हवम् ॥१७४४॥


स्वर रहित पद पाठ

अत्यायातम् । अति । आयातम् । अश्विना । तिरः । विश्वाः । अहम् । सना । दस्रा । हिरण्यवर्तनी । हिरण्य । वर्तनीइति । सुषुम्णा । सु । सुम्ना । सिन्धुवाहसा । सिन्धु । वाहसा । माध्वीइति । मम । श्रुतम् । हवम् ॥१७४४॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1744
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 12; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 19; खण्ड » 3; सूक्त » 3; मन्त्र » 2
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पदार्थ -

१. हे (अश्विना) = प्राणापानो ! (तिरः) = तिरोहित होकर - छिपकर रह रही (विश्वा) = सब कामादि वासनाओं को, हमारे न चाहते हुए भी हमारे अन्दर घुस आनेवाली आसुर वृत्तियों को आप (अति आयातम्) = लाँघ कर हमें प्राप्त होते हो । प्राणों की साधना से आसुर वृत्तियाँ पत्थर पर मिट्टी के ढेले के समान टकराकर नष्ट हो जाती हैं । २. इन वासनाओं के नाश के द्वारा ये प्राणापान (अहं सना) = उस अविनाशी प्रभु को प्राप्त करानेवाले हैं [अहम्-अहन्= अविनाशी, सन्=to acquire]। प्रभु-प्राप्ति का साधन वासना-विनाश ही तो है । ३. (दस्त्रा) =[दस् उपक्षये] ये प्राणापान शरीर के सब रोगों का और मन के सब मलों का नाश करनेवाले हैं । ४. (हिरण्यवर्तनी) = ये ज्योतिर्मय मार्गवाले हैं । वस्तुतः वीर्यरक्षा के द्वारा ज्ञानाग्नि को दीप्त करके ये प्राणापान हमारे जीवन को ज्योतिर्मय बनाते हैं ५. (सुषुम्णा) = ये उत्तम सुख देनेवाले हैं । शरीर को नीरोग, मन को निर्मल तथा बुद्धि को प्रकाशमय बनाकर ये मानव-जीवन को सुखी करते हैं । ६. (सिन्धुवाहसा) = ये प्राणापान शरीर में रुधिर का अभिसरण [सिन्धु] करनेवाले हैं। रुधिर के ठीक अभिसरण से शरीर का स्वास्थ्य ठीक बना रहता है ।७. . (माध्वी) = ये प्राणापान अत्यन्त मधुर हैं— जीवन को मधुर बनानेवाले हैं। ये (मम हवम् श्रुतम्) = मेरी पुकार को सुनें । मैं इनकी आराधना करूँ और ये मेरे जीवन को मधुर व सुन्दर बना दें।

भावार्थ -

ये प्राणापान वासनाओं को परे भगाकर हमें प्रभु के समीप पहुँचाते हैं।

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