Loading...

सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1800
ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः देवता - इन्द्रः छन्दः - विराडनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः काण्ड नाम -
1

भू꣢रि꣣ हि꣢ ते꣣ स꣡व꣢ना꣣ मा꣡नु꣢षेषु꣣ भू꣡रि꣢ मनी꣣षी꣡ ह꣢वते꣣ त्वा꣢मित् । मा꣢꣫रे अ꣣स्म꣡न्म꣢घव꣣ञ्ज्यो꣡क्कः꣢ ॥१८००॥

स्वर सहित पद पाठ

भू꣡रि꣢꣯ । हि । ते꣢ । स꣡व꣢꣯ना । मा꣡नु꣢꣯षेषु । भू꣡रि꣢꣯ । म꣣नीषी꣢ । ह꣣वते । त्वा꣢म् । इत् । मा । आ꣣रे꣢ । अ꣢स्म꣢त् । म꣣घवन् । ज्यो꣢क् । क꣣रि꣡ति꣢ ॥१८००॥


स्वर रहित मन्त्र

भूरि हि ते सवना मानुषेषु भूरि मनीषी हवते त्वामित् । मारे अस्मन्मघवञ्ज्योक्कः ॥१८००॥


स्वर रहित पद पाठ

भूरि । हि । ते । सवना । मानुषेषु । भूरि । मनीषी । हवते । त्वाम् । इत् । मा । आरे । अस्मत् । मघवन् । ज्योक् । करिति ॥१८००॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1800
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 13; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 3; सूक्त » 4; मन्त्र » 3
Acknowledgment

पदार्थ -

१. हे प्रभो ! (ते) = आपके (मानुषेषु) = मनुष्यों के निमित्त (सवना) = उत्पादन (हि) = निश्चय से (भूरि) = अनन्त हैं। आपने मनुष्यों के हित के लिए अनन्त वस्तुओं का निर्माण किया है। मनुष्य से उनका परिगणन क्या सम्भव हो सकता है ?

। २. इसलिए (मनीषी) = बुद्धिमान् पुरुष (त्वामित्) = आपको ही (भूरि) = बार-बार (हवते) = पुकारता है वह समझता है कि आप ही वस्तुतः उसका कल्याण करनेवाले हैं। सच्चे माता-पिता, भाई व बन्धु तो आप ही हैं। आपको पाया तो सभी कुछ पा लिया । आपको खोया तो वस्तुतः सर्वस्व ही खो दिया। ऐसा समझता हुआ यह कहता है कि

३. हे (मघवन्) - सब ऐश्वर्यों के स्वामिन् प्रभो ! अब तो आप (अस्मत् आरे) = हमसे दूर (मा ज्योक् कः) = देर तक निवास मत कीजिए। मैं आपके सन्दर्शन में होऊँ, आपकी कृपा-दृष्टि मुझपर पड़े । मैं आपको अपने से ओझल न करूँ और आपकी कृपादृष्टि का पात्र बनूँ ।

भावार्थ -

हे प्रभो ! आपके उपकार अनन्त हैं। मैं सदा आपको पुकारूँ और अपने को आपके समीप पाऊँ। मुझे तो तभी शान्ति होगी-तभी मेरी प्यास बुझेगी।

इस भाष्य को एडिट करें
Top