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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1820
ऋषिः - अग्निः पावकः देवता - अग्निः छन्दः - सतोबृहती स्वरः - पञ्चमः काण्ड नाम -
1

इ꣣ष्कर्त्ता꣡र꣢मध्व꣣रस्य꣣ प्र꣡चे꣢तसं꣣ क्ष꣡य꣢न्त꣣ꣳ रा꣡ध꣢सो म꣣हः꣢ । रा꣣तिं꣢ वा꣣म꣡स्य꣢ सु꣣भ꣡गां꣢ म꣣ही꣢꣯मिषं꣣ द꣡धा꣢सि सान꣣सि꣢ꣳ र꣣यि꣢म् ॥१८२०॥

स्वर सहित पद पाठ

इ꣣ष्क꣡र्ता꣢रम् । अ꣣ध्वर꣡स्य꣢ । प्र꣡चे꣢तसम् । प्र । चे꣡तसम् । क्ष꣡य꣢꣯न्तम् । रा꣡ध꣢꣯सः । म꣡हः꣢꣯ । रा꣣ति꣢म् । वा꣣म꣡स्य꣢ । सु꣣भ꣡गा꣢म् । सु꣣ । भ꣡गा꣢꣯म् । म꣣ही꣢म् । इ꣡ष꣢꣯म् । द꣡धा꣢꣯सि । सा꣣नसि꣢म् । र꣣यि꣢म् ॥१८२०॥


स्वर रहित मन्त्र

इष्कर्त्तारमध्वरस्य प्रचेतसं क्षयन्तꣳ राधसो महः । रातिं वामस्य सुभगां महीमिषं दधासि सानसिꣳ रयिम् ॥१८२०॥


स्वर रहित पद पाठ

इष्कर्तारम् । अध्वरस्य । प्रचेतसम् । प्र । चेतसम् । क्षयन्तम् । राधसः । महः । रातिम् । वामस्य । सुभगाम् । सु । भगाम् । महीम् । इषम् । दधासि । सानसिम् । रयिम् ॥१८२०॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1820
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 5
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 5; सूक्त » 2; मन्त्र » 5
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पदार्थ -

गत मन्त्र में प्रभु ने कहा था कि 'तू हमारे गौ आदि पशुओं से अपनी सम्पत्ति को विस्तृत कर' । प्रस्तुत मन्त्र में कहते हैं कि 'तुझे कैसी सम्पत्ति मिलेगी ?' – हे जीव! तू (रयिं दधासि) = उस सम्पत्ति को धारण करता है, जो -

१. (अध्वरस्य इष्कर्तारम्) = हिंसारहित यज्ञों को परिष्कृत करनेवाली हैं, अर्थात् जिसके द्वारा शतशः अध्वरों - यज्ञों का साधन होता है I

२. प्(रचेतसम्) = जो प्रकृष्ट चेतनावाली है । जो नमक- तेल- ईंधन की चिन्ता से बुद्धि को विलुप्त नहीं होने देती और न ही अपनी चकाचौंध से आँखों को चुँधिया ही देती है। 

३. (महः राधसः क्षयन्तम्) = जो महान् सफलता का निवास स्थान है, अर्थात् जिसके द्वारा हमारे संसार के आवश्यक कार्य पूर्ण होते हैं ।

४. (वामस्य रातिम्) = सब सुन्दर वस्तुओं को देनेवाली है । सम्पत्ति इतनी चाहिए कि वह जीवन को सुन्दर बनाने के लिए सब आवश्यक वस्तुओं को प्राप्त करा सके ।

५. (सुभगाम्) = जो सुन्दर है, अर्थात् जिसके प्राप्त होने से मेरे जीवन में कोई ऐसा परिवर्तन नहीं आता कि वह अखरने लगे ।

६. (महीम्) = जो सम्पत्ति [मह पूजायाम् ] मुझे पूजा की भावना से पृथक् नहीं कर देती ।

७. (इषम्) = जो मुझे गतिशील रखती है— अकर्मण्य नहीं बना देती ।

८. (सानसिम्) = जो संविभाग के योग्य है, अर्थात् मुझे वह सम्पत्ति दीजिए जिसका यज्ञों में विनियोग करके बची हुई का खानेवाला बनूँ ।

भावार्थ -

मैं सम्पत्ति को प्राप्त करूँ, उस सम्पत्ति को जोकि यज्ञों को सिद्ध करनेवाली हो ।

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