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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1819
ऋषिः - अग्निः पावकः
देवता - अग्निः
छन्दः - सतोबृहती
स्वरः - पञ्चमः
काण्ड नाम -
3
इ꣣रज्य꣡न्न꣢ग्ने प्रथयस्व ज꣣न्तु꣡भि꣢र꣣स्मे꣡ रायो꣢꣯ अमर्त्य । स꣡ द꣢र्श꣣त꣢स्य꣣ व꣡पु꣢षो꣣ वि꣡ रा꣢जसि पृ꣣ण꣡क्षि꣢ दर्श꣣तं꣡ क्रतु꣢꣯म् ॥१८१९॥
स्वर सहित पद पाठइरज्य꣢न् । अ꣣ग्ने । प्रथयस्व । जन्तु꣡भिः꣢ । अ꣣स्मे꣡इति । रा꣡यः꣢꣯ । अ꣣र्मत्य । अ । मर्त्य । सः꣢ । द꣣र्शत꣡स्य꣢ । व꣡पु꣢꣯षः । वि । रा꣣जसि । पृण꣡क्षि꣢ । द꣡र्शत꣢म् । क्र꣡तु꣢꣯म् ॥१८१९॥
स्वर रहित मन्त्र
इरज्यन्नग्ने प्रथयस्व जन्तुभिरस्मे रायो अमर्त्य । स दर्शतस्य वपुषो वि राजसि पृणक्षि दर्शतं क्रतुम् ॥१८१९॥
स्वर रहित पद पाठ
इरज्यन् । अग्ने । प्रथयस्व । जन्तुभिः । अस्मेइति । रायः । अर्मत्य । अ । मर्त्य । सः । दर्शतस्य । वपुषः । वि । राजसि । पृणक्षि । दर्शतम् । क्रतुम् ॥१८१९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1819
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 4
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 5; सूक्त » 2; मन्त्र » 4
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 4
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 5; सूक्त » 2; मन्त्र » 4
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विषय - गोधन और जीवन-सौन्दर्य
पदार्थ -
गत मन्त्र में सुन्दर जीवन का उल्लेख था । प्रस्तुत मन्त्र में सुन्दर जीवन के निर्माण के प्रमुख साधन का संकेत है। प्रभु कहते हैं कि (अग्ने) = उन्नति के इच्छुक जीव ! हे (अमर्त्य) = असमय में शरीर को न छोड़नेवाले अथवा लौकिक भोगों के पीछे न मरनेवाले जीव ! तू (रायः इरज्यन्) = धनों का स्वामी होना चाहता हुआ [इरज्य=to be master of] (अस्मे जन्तुभिः) = हमारे इन 'गौ, अश्व, अजा, अवि=ewe]' आदि पशुओं से (प्रथयस्व) = सम्पत्ति को विस्तृत कर - सम्पत्ति को बढ़ा ।
यहाँ ‘अग्ने' और 'अमर्त्य ' इन शब्दों से सम्बोधन करके जीव को स्पष्ट संकेत किया है कि यदि तू जीवन में प्रगति करना चाहता है, यदि तू दीर्घ जीवन का इच्छुक है, यदि तू चाहता है कि तेरे मन की भावनाएँ पवित्र बनी रहें, तू भोगासक्त न हो जाए तो तू अपनी सम्पत्ति को गौ आदि पशुओं के द्वारा ही बढ़ानेवाला बन । 'गोपालन, कृषि, ऊन व रेशम के कपड़ों का निर्माण'– ये सब कार्य पशुओं से सम्बद्ध होते हुए हमारे ऐश्वर्य को बढ़ानेवाले हैं । वैश्य ने इन्हीं कार्यों के द्वारा धन को बढ़ाने का यत्न करना है । ('अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व') = 'जूआ मत खेल, खेती ही कर ' यह वेद का स्पष्ट आदेश है । ('युनक्त सीरा:') = हल चलाओ यह वेद कह रहा है । ('ऊर्णासूत्रेण कवयो वयन्ति') = विद्वान् लोग ऊन के सूत से कपड़ा बुनते हैं – यह वेदवाक्य है । (‘येन धनेन प्रपणं चरामि')=इत्यादि मन्त्रों में धन के द्वारा क्रय-विक्रय व व्यापार का भी उल्लेख है, परन्तु सट्टे = speculation के ढंग के व्यापार का वेद में निषेध-ही- निषेध है । श्रम से प्राप्त धन ही ठीक है ।
यदि जीव इस निर्देश का पालन करेगा तो प्रभु कहते हैं कि (सः) = वह तू (दर्शतस्य वपुषः) = दर्शनीय सुन्दर शरीर से (विराजसि) = विशिष्टरूप से चमकता है। श्रम से प्राप्त धन शरीर को सुन्दर बनाता है। इतना ही नहीं, ऐसा करने पर तू (दर्शतं क्रतुम्) = दर्शनीय सुन्दर संकल्पों को (पृणक्षि) = मन में धारण करनेवाला होता है, सात्त्विक धन जहाँ शरीर को सुन्दर बनाता है वहाँ वह मन को भी पवित्र बनानेवाला होता है सात्त्विक धन के परिणामरूप मन में अशुभ संकल्प उत्पन्न नहीं होते।
इस मन्त्रार्थ से यह स्पष्ट हो जाता है कि वैदिक संस्कृति में 'गोपालन' का इतना महत्त्व क्यों है ? ऋषियों के आश्रमों की गौवों के बिना हम कल्पना ही नहीं कर पाते । वेद तो कहता है कि 'वसु, रुद्र व आदित्यों' का निर्माण करनेवाली तो गौ ही हैं । यही धन सात्त्विक है । गोधन ही धन है । एक युग था जब पशुधन ही धन समझा जाता था ‘pecuniary' यह इंग्लिश का शब्द भी उस युग का स्मरण कर रहा है। उस समय मनुष्यों के शरीर भी सुन्दर थे । उसी युग को लाने का हमें प्रयत्न करना है ।
भावार्थ -
प्रभु के आदेश को सुनते हुए हम गवादि पशुओं द्वारा ही धनी बनें और उनके दूध आदि के प्रयोग से सुन्दर, स्वस्थ, दर्शनीय शरीर व शिवसंकल्पात्मक मनोंवाले बनें ।
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