Loading...

सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1818
ऋषिः - अग्निः पावकः देवता - अग्निः छन्दः - सतोबृहती स्वरः - पञ्चमः काण्ड नाम -
3

ऊ꣡र्जो꣢ नपाज्जातवेदः सुश꣣स्ति꣢भि꣣र्म꣡न्द꣢स्व धी꣣ति꣡भि꣢र्हि꣣तः꣢ । त्वे꣢꣫ इषः꣣ सं꣡ द꣢धु꣣र्भू꣡रि꣢वर्पसश्चि꣣त्रो꣡त꣢यो वा꣣म꣡जा꣢ताः ॥१८१८॥

स्वर सहित पद पाठ

ऊ꣡र्जः꣢꣯ । न꣣पात् । जातवेदः । जात । वेदः । सुशस्ति꣡भिः꣢ । सु꣣ । शस्ति꣡भिः꣢ । म꣡न्द꣢꣯स्व । धी꣣ति꣡भिः꣢ । हि꣣तः꣢ । त्वे꣡इति꣢ । इ꣡षः꣢꣯ । सम् । द꣣धुः । भू꣡रि꣢꣯वर्पसः । भू꣡रि꣢꣯ । व꣣र्पसः । चित्रो꣡त꣢यः । चि꣣त्र꣢ । ऊ꣣तयः । वाम꣡जा꣢ताः । वा꣣म꣢ । जा꣣ताः ॥१८१८॥


स्वर रहित मन्त्र

ऊर्जो नपाज्जातवेदः सुशस्तिभिर्मन्दस्व धीतिभिर्हितः । त्वे इषः सं दधुर्भूरिवर्पसश्चित्रोतयो वामजाताः ॥१८१८॥


स्वर रहित पद पाठ

ऊर्जः । नपात् । जातवेदः । जात । वेदः । सुशस्तिभिः । सु । शस्तिभिः । मन्दस्व । धीतिभिः । हितः । त्वेइति । इषः । सम् । दधुः । भूरिवर्पसः । भूरि । वर्पसः । चित्रोतयः । चित्र । ऊतयः । वामजाताः । वाम । जाताः ॥१८१८॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1818
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 5; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
Acknowledgment

पदार्थ -

प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि ‘अग्नि-पावक’, प्रभु का ध्यान करता हुआ कहता है— १. (ऊर्जः नपात्) = आप मेरी शक्ति को न गिरने देनेवाले हैं [ऊर्ज्=शक्ति, न=नहीं, पात= गिरने देनेवाला] । सदा आपके समीप रहने से मैं व्यसनों से बचा रहता हूँ — भोगों में न फँसने से रोगों का शिकार भी नहीं होता, मेरी शक्ति स्थिर रहती है । २. (जातवेदः) = आप प्रत्येक उत्पन्न हुई वस्तु को जानते हैं—प्रत्येक पदार्थ में विद्यमान हैं। मैंने कर्म किया और आपने जाना, किया ही क्या, करने की सोची और आपने मेरी भावना जानी। आपसे मेरा छिपा ही क्या है, अतः आपके सामने ही धर्म के मार्ग का उल्लंघन करके आपका निरादर थोड़े ही करूँगा ? ३. (सुशस्तिभिः मन्दस्व) = आप मेरे उत्तम शंसनों व स्तुतियों द्वारा आनन्दित हों। मेरी आराधनाएँ आपको रिझाने में समर्थ हों। मैं अपनी स्तुतियों से आपको प्रसन्न कर सकूँ । ४. (धीतिभिः हितः) = आप ध्यान-क्रियाओं के द्वारा मुझमें स्थापित होते हैं। सर्वव्यापकता के नाते आप सर्वत्र हैं, परन्तु मैं ध्यान से ही तो आपको अपने अन्दर प्रतिष्ठित कर पाता हूँ। मेरे लिए तो आपकी प्रतिष्ठा मेरे हृदय मन्दिर में तभी होती है जब मैं ध्यानावस्थित होकर आपका दर्शन करने का प्रयत्न करता हूँ ।५. ऐसे ही लोग जोकि ध्यान से आपको हृदय-मन्दिर में प्रतिष्ठित पाते हैं (त्वे इषः सन्दधुः) = आप में स्थित होते हुए प्रेरणाओं को धारण करते हैं। आपकी प्रेरणा को सुनते हैं और तदनुसार ही अपने जीवन को बनाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि वे ६. (भूरिवर्पसः) = [वर्पस्=form, figure या praise] बड़ी सुन्दर आकृतिवाले होते हैं—आपके दर्शन के आनन्द की झलक उनके चेहरों को भी दीप्त करती है और उनके मुख से आपका अधिकाधिक स्तवन होने लगता है ७. (चित्र-ऊतयः) = इनका जीवन अद्भुत रक्षणोंवाला होता है । उस अमृत प्रभु के रक्षण में इनपर कोई भी आसुर वृत्ति आक्रमण कर ही कैसे सकती है ? अमृत आपसे आवेष्टित होने पर मृत्यु इन तक पहुँच ही कैसे सकती है ? ८. (वाम-जाता:) = परिणामतः इनका जीवन [जात] बड़ा सुन्दर [वाम] बन जाता है। प्रभु के दर्शन में जीवन सुन्दर नहीं बनेगा तो बनेगा ही कब ?

भावार्थ -

प्रभु की उपासना में मेरा जीवन सुन्दर, सुन्दरतर व सुन्दरतम होता चले।

इस भाष्य को एडिट करें
Top